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अथर्ववेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

अथर्ववेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

Atharvaveda Samhita with Hindi Translation

by डा. गंगा सहाय शर्मा

Source: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (origin)

DevanagariSanskritpublished1,063 pages

Page 956 of 1063

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Page 956

सूक्त-३६ देवता—इंद्र
य एक इद्धव्यश्चर्षणीनामिन्द्रं तं गीर्भिरभ्यर्च आभिः.
यः पत्यते वृषभो वृष्णयावान्त्सत्यः सत्वा पुरुमायः सहस्वान्.. (१)
जो इंद्र यजमानों के यज्ञों में प्रधान रूप से आह्वान करने योग्य हैं, उन की मैं उन
वाणियों के द्वारा स्तुति करता हूं, जिनके स्वामी इंद्र हैं. वे कामनाओं को पूर्ण करने वाले इंद्र
की स्तुतियों के द्वारा प्रार्थना की जाती है. वे इंद्र बल के विनाशक, अनेक कर्म करने वाले
तथा शक्तिशाली हैं. (१)
तमु नः पूर्वे पितरो नवग्वाः सप्त विप्रासो अभि वाजयन्तः.
नक्षद्दाभं ततुरिं पर्वतेष्ठान्मद्रोघवाचं मतिभिः शविष्ठम्.. (२)
हमारे समर्थ पूर्व पुरुषों ने हवि रूपी अन्न दे कर इंद्र की कामना की तब वे नौ महीनों के
बाद सिद्धि प्राप्त कर पाए. इंद्र की स्तुति करते हुए उन्होंने पितृलोक प्राप्त किया. इंद्र शत्रुओं
की हिंसा करते हैं. दुर्गम मार्ग को पार करते हैं तथा अतिशय शक्तिशाली हैं. इंद्र की आज्ञा का
कोई उल्लंघन नहीं कर सकता. (२)
तमीमह इन्द्रमस्य रायः पुरुवीरस्य नृवतः पुरुक्षोः.
यो अस्कृधोयुरजरः स्वर्बान् तमा भर हरिवो मादयध्यै.. (३)
हम इंद्र से वीर पुत्रों एवं सेवकों के साथ असीमित धन की याचना करते हैं. हे इंद्र देव!
हमें ऐसा धन दो जो कभी समाप्त न हो तथा हमें सुख देता रहे. (३)
तन्नो वि वोचो यदि ते पुरा चिज्जजितार आनशुः सुम्नमिन्द्र.
कस्वे भागः किं वयो दुध्र खिद्रः पुरुहूत पुरूवसोऽसुरघ्नः.. (४)
हे इंद्र देव! हम स्तोताओं को तुम वह सुख प्रदान करो, जिसे प्राचीन काल के स्तोताओं
ने प्राप्त किया था. यज्ञ में निकटस्थ तुम्हारा भाग कौन सा है? क्या वह तुम्हें देने योग्य हवि
लक्षण वाला आगे है. हे दुख से धारण करने योग्य, शत्रुओं को कष्ट देने वाले, बहुतों के द्वारा
यज्ञों में बुलाए गए एवं बहुत धन वाले इंद्र! हमें यह बताइए. (४)
तं पृच्छन्ती वज्रहस्तं रथेष्ठामिन्द्रं वेपी वक्वरी यस्य नू गीः.
तुविग्राभं तुविकूर्मिं रभोदां गातुमिषे नक्षते तुम्रमच्छ (५)
वज्रधारणकर्ता तथा रथ में विराजमान इंद्र को जिस स्तोत्र की स्तुति प्राप्त होती है,
अनेक प्रकार के कर्म करने वाले तथा शक्तिशाली जिस इंद्र से यजमान सुख पाने की इच्छा
करता है, वह इंद्र को प्राप्त कर लेता है तथा अपने वश में कर लेता है. (५)
अया ह त्यं मायया वावृधानं मनोजुवा स्वतवः पर्वतेन.