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अथर्ववेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

अथर्ववेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

Atharvaveda Samhita with Hindi Translation

by डा. गंगा सहाय शर्मा

Source: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (origin)

DevanagariSanskritpublished1,063 pages

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इन्हीं इंद्र के दीप्त बल के कारण बहने वाली नदियां अपनेअपने स्थान पर सुशोभित
होती हैं, क्योंकि इंद्र ने अपने वज्र से उन्हें नियंत्रित किया है. इंद्र शत्रुओं का वध कर के स्वयं
को स्वामी बनाते हुए हवि देने वाले यजमान के लिए अन्न प्रदान करते हैं. (११)
अस्मा इदु प्र भरा तूतुजानो वृत्राय वज्रमीशानः कियेधाः.
गोर्न पर्व वि रदा तिरश्चेष्यन्नर्णस्यापं चरध्यै.. (१२)
वृत्र राक्षस के वध के लिए अत्यधिक शीघ्रता करते हुए सब के स्वामी इंद्र शत्रु की सेना
कितनी है, ऐसा कह कर उस का बल हरण करने वाले तुम वज्र का प्रहार करो. जिस प्रकार
पशुओं के मांस के टुकड़े किए जाते हैं, उसी प्रकार तुम शत्रुओं पर प्रहार करो. हे इंद्र! तुम
जल की इच्छा करते हुए भूमि पर जल के प्रवाह के लिए वृत्र के शरीर को अपने वज्र से नष्ट
कर दो. (१२)
अस्येदु प्र ब्रूहि पूर्व्याणि तुरस्य कर्माणि नव्य उक्थैः.
युधे यदिष्णान आयुधान्यृघायमाणो निरिणाति शत्रून्.. (१३)
अपनी स्तुतियों में इंद्र की प्रशंसा करो. हे स्तोता! स्तुतियों के योग्य इंद्र की स्तुतियों से
प्रशंसा करो. जब इंद्र युद्ध के लिए अपने आयुधों को चलाते हुए तथा शत्रुओं की हिंसा करते
हुए उन की ओर जाते हैं, हे स्तोता! उस समय स्तुतियों का उच्चारण करो. (१३)
अस्येदु भिया गिरयश्च दृळ्हा द्यावा च भूमा जनुषस्तुजेते.
उपो वेनस्य जोगुवान ओणिं सद्यो भुवद् वीर्याय नोधाः.. (१४)
इन इंद्र के जन्म से ही पंख कटने के भय से पर्वत भी दृढ़ हो गए थे. इंद्र के भय से
धरती और स्वर्ग भी कांपते हैं. इन इंद्र की अनेक स्तोत्रों से प्रशंसा कर के नोधा नाम के ऋषि
सामर्थ्य वाले हुए. (१४)
अस्मा इदु त्यदनु दाय्येषामेको यद् वव्रे भूरेरीशानः.
प्रैतशं सूर्ये पस्पृधानं सौवश्व्ये सुष्षिमावदिन्द्रः.. (१५)
इन्हीं इंद्र के लिए स्तुतियों और सोम लक्षण अन्न प्रदान किया जाता है. इस कारण
अधिक धन के स्वामी इंद्र स्तोत्र आदि के विषय में अद्वितीय हुए. इंद्र ने सौवश्य की रक्षा के
अवसर पर सूर्य से अधिक तेजस्वी एतश नाम वाले ऋषि की भी रक्षा की थी. (१५)
एवा ते हारियोजना सुवृक्तीन्द्र ब्रह्माणि गोतमासो अक्रन्.
ऐषु विश्वपेशां धियं धाः प्रातर्मक्षू धियावसुर्जगम्यात्.. (१६)
हे इंद्र! गौतम गोत्र वाले अनेक ऋषि तुम्हारे लिए मंत्र रूपी स्तोत्रों का उच्चारण कर रहे
हैं. इन स्तुतिकर्ताओं को अनेक प्रकार का धन और अन्न प्रदान करो. जिस प्रकार इंद्र देव इस
समय हमारी रक्षा के लिए आए हैं, उसी प्रकार वे अन्य दिनों में हमारे यज्ञ में आएं. (१६)
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