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अथर्ववेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

अथर्ववेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

Atharvaveda Samhita with Hindi Translation

by डा. गंगा सहाय शर्मा

Source: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (origin)

DevanagariSanskritpublished1,063 pages

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Page 939

हे इंद्र! तुम ने सहायक विहीन सुश्रवा राजा को घेरने वाले साठ हजार निन्यानवे
सेनापतियों को अपने उस चक्र से नष्ट कर दिया जो रक्षा के योग्य था और जिसे शत्रु प्राप्त
नहीं कर सकते थे. (९)
त्वांमाविथ सुश्रवसं तवोतिभिस्तव त्रामभिरिन्द्र तूर्वयाणम्.
त्वमस्मै कुत्समतिथिग्वमायुं महे राज्ञे यूने अरन्धनायः.. (१०)
हे इंद्र! तुम ने सहायक विहीन राजा सुश्रवा की अपने रक्षा साधनों से रक्षा की. तुम ने
तूर्वयाण नाम के राजा का पालन किया. तुम ने युवराज बने हुए कुत्स, अतिथिग्व और आयु
का आश्रय सुश्रवा को प्राप्त कराया. (१०)
य उद्दीचीन्द्र देवगोपाः सखायस्ते शिवतमा असाम.
त्वां स्तोषाम त्वया सुवीरा द्राघीय आयुः प्रतरं दधानाः.. (११)
हे इंद्र! इस यज्ञ की समाप्ति पर हमें तुम्हारी रक्षा प्राप्त हो. सखा के समान तुम्हारे
अत्यंत प्रिय होते हुए हम इस यज्ञ के बाद भी अतिशय कल्याणों को प्राप्त करें. इस यज्ञ की
समाप्ति के उत्तरकाल में भी हम तुम्हारी स्तुति करें. तुम्हारी स्तुतियां करते हुए हम शोभन
पुत्रों को तथा दीर्घ आयु को प्राप्त करें. (११)
सूक्त—२२ देवता—इंद्र
अभि त्वा वृषभा सुते सुतं सृजामि पातये. तृम्पा व्य श्नुही मदम्.. (१)
हे वर्षा करने वाले इंद्र! सोम के निचोड़ लिए जाने पर एवं शुद्ध हो जाने पर हम उसे
पीने के लिए तुम्हें बुलाते हैं. उस हर्षदायक सोम को पी कर तुम तृप्त बनो. तुम उस प्रसन्न
करने वाले सोम रस को विशेष रूप से प्राप्त करो. (१)
मा त्वा मूरा अविष्यवो मोपहस्वान आ दभन्. माकीं ब्रह्मद्विषो वनः.. (२)
हे इंद्र! तुम्हारी कृपा से हम अपने पालन की इच्छा करते हैं. अपनी रक्षा का उपाय न
जानते हुए मूर्ख तुम्हारी हिंसा न करें. जो ब्राह्मणों से द्वेष करने वाले हैं, तुम उन की सेवा को
स्वीकार मत करो. (२)
इह त्वा गोपरीणसा महे मन्दन्तु राधसे. सरो गौरो यथा पिब.. (३)
हे इंद्र! ऋत्विज् धन प्राप्ति के लिए तुम्हें गाय के दूध से मिश्रित सोमरस दे कर प्रसन्न
करें. गौर मृग अत्यधिक प्यासा होने पर जिस प्रकार जल पीता है, तुम उसी प्रकार सोमरस
को पियो. (३)
अभि प्र गोपतिं गिरेन्द्रमर्च यथा विदे. सूनुं सत्यस्य सत्पतिम्.. (४)
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