अथर्ववेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)
Atharvaveda Samhita with Hindi Translation
by डा. गंगा सहाय शर्मा
Source: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (origin)
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Read in contextइन्द्रेण दस्युं दरयन्त इन्दुभिर्युतद्वेषसः समिषा रभेमहि.. (४)
हे इंद्र! हमारी अधिक हवि और सोमरस से प्रसन्न होते हुए तुम गाय और अश्व आदि
धन दे कर हमारी दरिद्रता समाप्त करो. हे शोभन मन वाले इंद्र! हमारे द्वारा दिए हुए सोमरसों
से प्रसन्न हो कर तुम शत्रुओं की हिंसा करते हुए हमें शत्रुविहीन बनाओ. हम इंद्र के द्वारा दिए
हुए अन्न से संपन्न हों. (४)
समिन्द्र राया समिषा रभेमहि सं वाजेभिः पुरुश्चन्द्रैरभिद्युभिः.
सं देव्या प्रमत्या वीरशुष्मया गोअग्रया ऽ श्वावत्या रभेमहि.. (५)
हे इंद्र! हम सब के द्वारा चाहे गए धन से संपन्न हों. हम प्रजाओं को प्रसन्न करने वाले
बल से युक्त हों. हमें तुम्हारी कृपामयी बुद्धि प्राप्त हो. वह बुद्धि हमें गायों को देने वाली तथा
हमारे क्लेशों का निवारण करने वाली हो. (५)
ते त्वा मदा अमदन् तानि वृष्ण्या ते सोमासो वृत्रहत्येषु सत्पते.
यत् कारवे दश वृत्राण्यप्रति बर्हिष्मते नि सहस्राणि बर्हयः.. (६)
हे सज्जनों के रक्षक इंद्र! शत्रुओं के हनन कर्म में प्रसिद्ध एवं मादक आज्य, पुरोडाश
आदि तुम्हें प्रसन्न करें. हमारे प्रसिद्ध स्तोत्र भी प्रसन्नता के साधन होने के कारण तुम्हें हर्षित
करें. प्रसिद्ध सोमरस भी तुम्हें प्रसन्न करें. स्तुति करते हुए यजमान के दस सहस्र पापों को
तुम समाप्त करो. (६)
युधा युधमुप घेदेषि धृष्णुया पुरा पुरं समिदं हंस्योजसा.
नम्या यदिन्द्र सख्या परावति निबर्हयो नमुचिं नाम मायिनम्.. (७)
हे इंद्र! तुम अपने प्रहार के साधन वज्र के द्वारा शत्रुओं के आयुधों पर आक्रमण करते
हो. तुम शत्रुओं के नगरों में निवास करने वाले वीरों को अपने मरुद्गण आदि वीरों के द्वारा
नष्ट कराते हो. तुम ने मायावी नमुचि का संहार किया था, इसलिए हम तुम्हारी स्तुति करते हैं.
(७)
त्वं करञ्जमुत पर्णयं वधीस्तेजिष्ठया तिथिग्वस्य वर्तनी.
त्वं शता वङ्गॄदस्याभिनत् पुरो ऽ नानुदः परिषूता ऋजिश्वना.. (८)
हे इंद्र! तुम ने अपनी अतिशय तेज युक्त वर्तनी नाम की शक्ति से अतिथि अतिथिग्व के
राजा के शत्रुओं करंज एवं पर्णय असुरों का वध किया था. तुम ने ऋजिश्व राजा के शत्रु
वंगृदासुर के सौ नगरों का भी विध्वंस किया था. (८)
त्वमेतां जनराज्ञो द्विर्दशाबन्धुना सुश्रवसोपजग्मुषः.
षष्टिं सहस्रा नवतिं नव श्रुतो नि चक्रेण रथ्या दुष्पदावृणक्.. (९)
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