अथर्ववेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)
Atharvaveda Samhita with Hindi Translation
by डा. गंगा सहाय शर्मा
Source: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (origin)
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Read in contextसूक्त-२२ देवता—चंद्र
चन्द्र यत् ते तपस्तेन तं प्रति तप यो ३ स्मान् द्वेष्टि यं वयं द्विष्मः.. (१)
हे चंद्र देव! तुम्हारी जो दूसरों को संतप्त करने की शक्ति है, उस से उन्हें संतप्त करो जो
हम से द्वेष करते हैं अथवा हम जिन से द्वेष करते हैं. (१)
चन्द्र यत् ते हरस्तेन तं प्रति हर यो ३ स्मान् द्वेष्टि यं वयं द्विष्मः.. (२)
हे चंद्र देव! तुम्हारी जो छीनने की शक्ति है, उस का प्रयोग उन लोगों के सुख, शांति एवं
शक्ति छीनने के लिए करो जो हम से द्वेष करते हैं अथवा हम जिन से द्वेष करते हैं. (२)
चन्द्र यत् ते ऽ र्चिस्तेन तं प्रत्यर्च यो ३ स्मान् द्वेष्टि यं वयं द्विष्मः.. (३)
हे चंद्र देव! तुम्हारी जो दीप्ति है, उस से उन लोगों को दीप्तिहीन बनाओ, जो हम से
द्वेष करते हैं अथवा हम जिन से द्वेष करते हैं. (३)
चन्द्र यत् ते शोचिस्तेन तं प्रति शोच यो ३ स्मान् द्वेष्टि यं वयं द्विष्मः.. (४)
हे चंद्र देव! तुम्हारी जो दूसरों को शोक मग्न करने की शक्ति है, उस के द्वारा उन्हें शोक
मग्न करो जो हम से द्वेष करते हैं अथवा हम जिन से द्वेष करते हैं. (४)
चन्द्र यत् ते तेजस्तेन तमतेजसं कृणु यो ३ स्मान् द्वेष्टि यं वयं द्विष्मः.. (५)
हे चंद्र देव! तुम्हारा जो तेज है, उस से उन्हें तेजहीन करो, जो हम से द्वेष करते हैं
अथवा हम जिन से द्वेष करते हैं. (५)
सूक्त-२३ देवता—आप अर्थात् जल
आपो यद् वस्तपस्तेन तं प्रति तपत यो ३ स्मान् द्वेष्टि यं वयं द्विष्मः.. (१)
हे जल देव! तुम्हारी जो दूसरों को संताप देने की शक्ति है, उस से उन्हें संताप प्रदान
करो जो हम से द्वेष करते हैं और हम जिन से द्वेष करते हैं. (१)
आपो यद् वो हरस्तेन तं प्रति हरत यो ३ स्मान् द्वेष्टि यं वयं द्विष्मः.. (२)
हे जल देव! तुम्हारी जो हरण करने की शक्ति है, उस से उन की सुखशांति का हरण
करो जो हम से द्वेष करते हैं अथवा हम जिन से द्वेष करते हैं. (२)
आपो यद् वो ऽ र्चिस्तेन तं प्रत्यर्चत यो ३ स्मान् द्वेष्टि यं वयं द्विष्मः.. (३)
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