अथर्ववेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)
Atharvaveda Samhita with Hindi Translation
by डा. गंगा सहाय शर्मा
Source: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (origin)
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Read in contextबीसवां कांड
सूक्त—१ देवता—यज्ञ
इन्द्र त्वा वृषभं वयं सुते सोमे हवामहे. स पाहि मध्वो अन्धसः.. (१)
हे कामनाओं की वर्षा करने वाले इंद्र! हम यजमान निचोड़े हुए सोम को पीने के लिए
तुम्हें बुलाते हैं. तुम मधुर सोम का पान करो. (१)
मरुतो यस्य हि क्षये पाथा दिवो विमहसः.. स सुगोपातमो जनः.. (२)
हे अतिशय तेज युक्त मरुतो! तुम आकाश से आ कर जिस यजमान की यज्ञशाला में
सोमपान करते हो, उस गृह का स्वामी यजमान अपने आश्रितों की रक्षा वालों में श्रेष्ठ बन
जाता है. (२)
उक्षान्नाय वशान्नाय सोमपृष्ठाय वेधसे. स्तोमैर्विधेमाग्नये.. (३)
गर्भधारण करने में समर्थ बैल और बांझ बकरी जिस का भोजन है तथा सोम जिस के
ऊपर स्थित है, ऐसे अग्नि देव की हम वेद मंत्रों द्वारा स्तुति करते हैं. (३)
सूक्त—२ देवता—मरुत्, अग्नि, इंद्र,
द्रविणोदा
मरुतः पोत्रात् सुष्टुभः स्वर्कादृतुना सोमं पिबन्तु.. (१)
मरुद्गण होता के सुंदर स्तोत्रों वाले तथा सुंदर मंत्रों से युक्त यज्ञ कर्म में संस्कार किए
गए अर्थात् कूटे और निचोड़े गए सोम का पान करें. (१)
अग्निराग्नीध्रात् सुष्टुभः स्वर्कादृतुना सोमं पिबतु.. (२)
अग्नि देव! अग्नि को प्रज्वलित करने वाले ऋत्विज् के कर्म से प्रसन्न होते हुए सोम रस
का पान करें. यह कर्म सुंदर स्तोत्रों और सुंदर मंत्रों वाला है. (२)
इन्द्रो ब्रह्मा ब्राह्मणात् सुष्टुभः स्वर्कादृतुना सोमं पिबतु.. (३)
ब्रह्मात्मा इंद्र! ब्राह्मण नाम के ऋत्विज् की सुंदर स्तुतियों से पूर्ण यज्ञ कर्म में संस्कार
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