अथर्ववेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)
Atharvaveda Samhita with Hindi Translation
by डा. गंगा सहाय शर्मा
Source: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (origin)
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Read in contextसर्वं तदस्तु मे शिवं तज्जुषस्व यविष्ठ्य.. (३)
हे अग्नि! मैं तुम्हारे लिए जो यज्ञ के योग्य और यज्ञ के अयोग्य काष्ठ (लकड़ी) प्रदान
करता हूं, वह सब मेरे लिए कल्याणकारी हो अर्थात् उन से मेरा कल्याण हो. हे अतिशय युवा
अग्नि! तुम मेरे द्वारा दिए गए काष्ठ (लकड़ी) को स्वीकार करो. (३)
एतास्ते अग्ने समिधस्त्वमिद्धः समिद् भव.
आयुरस्मासु धेह्यामृतत्वमाचार्याय.. (४)
हे अग्नि! मैं तुम्हारे लिए ये समिधाएं लाया हूं. उन समिधाओं के द्वारा तुम प्रज्वलित
होओ. तुम हम सब में आयु और जीवन का आधान करो. तुम हमारे उपाध्याय के लिए अमृत
प्रदान करो. (४)
सूक्त—६५ देवता—सूर्य, जातवेद, वज्र
हरिः सुपर्णो दिवमारुहो ऽ र्चिषा ये त्वा दिप्सन्ति दिवमुत्पतन्तम्.
अव तां जहि हरसा जातवेदो ऽ बिभ्यदुग्रो ऽ र्चिसा दिवमा रोह सूर्य.. (१)
हे सूर्य! तुम अंधकार का नाश करने वाले तथा उत्तम पालन वाले हो. तुम अपने तेज से
द्युलोक अर्थात् आकाश पर बढ़ते हो. आकाश पर चढ़ते हुए तुम को जो शत्रु तिरस्कृत करना
चाहते हैं, हे जातवेद सूर्य! उन्हें तुम अपने शत्रु विनाशक तेज से नष्ट करो. इस के पश्चात
शत्रुओं से भयभीत न होते हुए तुम अपने तेज से आकाश में स्थित बनो. (१)
सूक्त—६६ देवता—सूर्य, जातवेद
अयोजाला असुरा मायिनो ऽ यस्मयैः पाशैरङ्किनो ये चरन्ति.
तांस्ते रन्धयामि हरसा जातवेदः सहस्रऋष्टिः सपत्नान् प्रमृणन् पाहि
वज्रः.. (१)
हे जातवेद सूर्य! जो मायावी असुर लोहे का जाल ले कर तथा लोहे के बने फंदे हाथ में
ले कर उत्तम कर्म करने वालों को मारने के लिए घूमते हैं, उन्हें मैं तुम्हारे तेज के द्वारा अपने
वश में करता हूं. हे हजार संख्या वाले आयुधों से युक्त तथा वज्रधारी! तुम शत्रुओं को अधिक
मात्रा में नष्ट करो तथा हमारा पालन करो. (१)
सूक्त—६७ देवता—सूर्य
पश्येम शरदः शतम्.. (१)
हे सूर्य! हम सौ वर्षों तक देखते रहें. (१)
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