अथर्ववेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)
Atharvaveda Samhita with Hindi Translation
by डा. गंगा सहाय शर्मा
Source: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (origin)
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Read in contextव्यथित कर के सूर्य के समान चारों दिशाओं को प्रकाशित करो. (५)
सूक्त-३४ देवता—जंगिड़ वनस्पति
जङ्गिडो ऽ सि जङ्गिडो रक्षितासि जङ्गिड:.
द्विपाच्चतुष्पादस्माकं सर्वं रक्षतु जङ्गिड:.. (१)
हे जंगिड़ नाम की ओषधि अर्थात् जड़ीबूटी! तुम कृत्या नाम की राक्षसी को तथा उस
के द्वारा किए हुए कर्मों को निगल लेती हो. इस आधार पर तुम सभी भयों से रक्षा करने वाली
होती हो. हे जंगिड़! तुम हमारे दो पैरों वाले पुत्र, पौत्र आदि की तथा चार पैरों वाले गाय, अश्व
आदि पशुओं की रक्षा करो. (१)
या गृत्स्यस्त्रिपञ्चाशी: शतं कृत्याकृतश्च ये.
सर्वान् विनक्तु तेजसो ऽ रसांजङ्गिडस्करत्.. (२)
तिरेपन प्रकार की जो हानि पहुंचाने वाली राक्षसियां, कृत्याएं है तथा पुतलियां बनाने
वाले जो सैकड़ों जादूटोना करने वाले हैं, जंगिड नाम की ओषधि से बनी हुई मणि उन सभी
को नष्ट शक्ति वाला तथा रसहीन करे. (२)
अरसं कृत्रिमं नादमरसा: सप्त विस्रस:.
अपेतो जङ्गिडामतिमिशुमस्तेव शातय.. (३)
अभिचार अर्थात् जादूटोना करने वाले के द्वारा उत्पन्न की गई हानि को यह जंगिड मणि
सारहीन करे. सात छेदों—नाक, नेत्र, कान तथा मुख में उत्पन्न किए गए अभिचार कर्म को
यह जंगिड मणि नष्ट करे. बाण फेंकने वाला शत्रुओं को जिस प्रकार नष्ट कर देता है, उसी
प्रकार जंगिड मणि हम से दुर्बुद्धि और दरिद्रता को दूर करे. (३)
कृत्यादूषण एवायमथो अरातिदूषण:.
अथो सहस्वाज्जङ्गिड: प्र ण आयूंषि तारिषत्.. (४)
यह जंगिड़ मणि शत्रु के द्वारा उत्पन्न कृत्या राक्षसी का निराकरण करने वाली है तथा
शत्रु को नष्ट करने का साधन है. यह जंगिड़ मणि ऊपर बताए हुए कार्यों की शक्ति से युक्त है.
यह हमारी आयु को बढ़ाए. (४)
स जङ्गिडस्य महिमा परि ण: पातु विश्वतः.
विष्कन्धं येन सासह संस्कन्धमोज ओजसा.. (५)
जंगिड़ मणि का यह महत्त्व सभी ओर से हमारी रक्षा करे. यह मणि विस्कंद नाम के
वातरोग को अपने बल से नष्ट करती है. (५)
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