अथर्ववेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)
Atharvaveda Samhita with Hindi Translation
by डा. गंगा सहाय शर्मा
Source: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (origin)
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Read in contextएकत्र करता है. (१०)
सूक्त-३३ देवता—दर्भ
सहस्रार्घः शतकाण्डः सहस्वानपामग्निर्विरुधां राजसूयम्.
स नो ऽ यं दर्भः परि पातु विश्वतो देवो मणिरायुषा सं सृजाति नः.. (१)
बहुमूल्य, सौ गांठों वाली, शक्ति संपन्न, जलों की अग्नि अर्थात् वाडवाग्नि, राजसूय कर्म
के समान यह दर्भ चारों ओर से हमारी रक्षा करे. यह देवों के द्वारा निर्मित मणि हमें आयु से
मिलाए. (१)
घृतादुल्लुप्तो मधुमान् पयस्वान् भूमिंदृंहोऽच्युतश्च्यावयिष्णुः.
नुदन्सपत्नानधराँश्च कृण्वन् दर्भा रोह महतामिन्द्रियेण.. (२)
हवन करने से शेष बचे घृत से चिकना बना हुआ, मधुरता से युक्त, अधिक दूध वाला,
अपनी जड़ों से धरती को दृढ़ करने वाला, अपने स्थान से पतित न होने वाला, दूसरों का
पतन कराने वाला, शत्रुओं को दूर भगाता हुआ और शक्ति हीन बनाता हुआ दर्भ अन्य
अधिक बल युक्त ओषधियों अर्थात् जड़ीबूटियों में इंद्र के द्वारा प्रदत्त सामर्थ्य से स्थित बने.
(२)
त्वं भूमित्येष्योजसा त्वं वेद्यां सीदसि चारुरध्वरे.
त्वां पवित्रमृषायो ऽ भरन्त त्वं पुनीहि दुरितान्यस्मत्.. (३)
हे दर्भमणि! तुम अपने बल से भूमि का अतिक्रमण करते हो. तुम यज्ञ में सुंदर वेदी पर
स्थित होते हो. ऋषियों ने तुम्हें पवित्र करके आहरण किया है. तुम पापों को हम से दूर
भगाओ. (३)
तीक्ष्णो राजा विषासही रक्षोहा विश्वचर्षणिः.
ओजो देवानां बलमुग्रमेतत् तं ते बध्नामि जरसे स्वस्तये.. (४)
तीक्ष्ण, सभी ओषधियों में श्रेष्ठ, विशेष रूप से शत्रु नाशक, राक्षसों का हनन करने
वाला, सारे संसार को देखने वाला, देवों का बल तथा दूसरों के द्वारा असहनीय शक्ति संपन्न
यह दर्भ नाम का रक्षा साधन है. हे रक्षा की इच्छा करने वाले पुरुष! इस प्रकार की दर्भमणि
को मैं तेरी वृद्धावस्था दूर करने एवं कल्याण के लिए तेरे हाथ में बांधता हूं. (४)
दर्भेण त्वं कृण्वद् वीर्याणि दर्भ बिभ्रदात्मना मा व्यथिष्ठाः.
अतिष्ठाया वर्चसाधान्यान्त्सूर्य इवा भाहि प्रदिशश्चतस्रः.. (५)
हे पुरुष! तुम दर्भमणि रूपी साधन के द्वारा वीरता पूर्ण कर्म करो. शक्ति के साधन इस
दर्भमणि को धारण करते हुए तुम दुःखी मत होओ. तुम अपने शरीर के बल से शत्रुओं को
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