Skip to content
SarvaKosh
अथर्ववेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

अथर्ववेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

Atharvaveda Samhita with Hindi Translation

by डा. गंगा सहाय शर्मा

Source: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (origin)

DevanagariSanskritpublished1,063 pages

Page 858 of 1063

Read in context
Page 858

ये माघायव उदीच्या दिशो ऽ भिदासात्.. (७)
दूसरों की हिंसा करने के इच्छुक जो शत्रु हैं, वे उत्तर दिशा से आ कर रात्रि की अर्चना
करने वाले मेरी हिंसा करें, वे सप्त ऋषियों का सहयोग प्राप्त करने वाले विश्वकर्मा को अपने
विनाश के हेतु प्राप्त हों. (७)
इन्द्रं ते मरुत्वन्तमृच्छन्तु. ये माघायव एतस्या दिशो ऽ भिदासात्.. (८)
दूसरों की हिंसा करने के इच्छुक जो शत्रु उत्तर दिशा से आ कर रात्रि की अर्चना करने
वाले मेरी हिंसा करें, वे मरुतों का सहयोग प्राप्त करने वाले इंद्र को अपने विनाश के लिए
प्राप्त हों. (८)
प्रजापतिं ते प्रजननवन्तमृच्छन्तु. ये माघा ऽ यवा ध्रुवाया दिशो ऽ
भिदासात्.. (९)
दूसरों की हिंसा करने के इच्छुक जो शत्रु पृथ्वी की दिशा से आ कर रात्रि की अर्चना
करने वालो मेरी हिंसा करे, वे अपने विनाश के लिए प्रजनन में समर्थ प्रजापति को प्राप्त हों.
(९)
बृहस्पतिं ते विश्वदेववन्तमृच्छन्तु.
ये माघा ऽ यव ऊर्ध्वाया दिशो ऽ भिदासात्.. (१०)
दूसरों की हिंसा के इच्छुक जो शत्रु ऊपर की दिशा से आ कर मुझ रात्रि की अर्चना
करने वाले की हिंसा करें, वे अपने विनाश के लिए विश्वे देवों से युक्त बृहस्पति को प्राप्त हों.
(१०)
सूक्त-१९ देवता—मंत्र में कहे गए
मित्रः पृथिव्योदक्रामत् तां पुरं प्र णयामि वः.
तामा विशत तां प्र विशत सा वः शर्म च वर्म च यच्छतु.. (१)
मित्र नाम वाले अग्नि जिस पुर की रक्षा के लिए पृथ्वी से उठते हैं, उस शय्या युक्त पुर में
मैं तुझ राजा को पत्नी और प्रजा के साथ प्रवेश कराता हूं. वह पुर तुम को सुख और कवच
अर्थात् रक्षा प्रदान करे. (१)
वायुरन्तरिक्षेणोदक्रामत् तां पुरं प्र णयामि वः.
तामा विशत तां प्र विशत सा वः शर्म च वर्म च यच्छतु.. (२)
वायु अंतरिक्ष अर्थात् मध्यम लोक से जिस पुर की रक्षा के लिए अंतरिक्ष से उठते हैं,
उस शय्या युक्त पुर में मैं तुझ राजा को पत्नी और प्रजा के साथ प्रवेश कराता हूं. वह पुर तुम
ebook converter DEMO Watermarks*