Skip to content
SarvaKosh
अथर्ववेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

अथर्ववेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

Atharvaveda Samhita with Hindi Translation

by डा. गंगा सहाय शर्मा

Source: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (origin)

DevanagariSanskritpublished1,063 pages

Page 857 of 1063

Read in context
Page 857

अग्निं ते वसुवन्तमृच्छन्तु. ये माघा ऽ यवः प्राच्या दिशो ऽ भिदासात्.. (१)
जो मेरी हिंसा रूपी पाप की इच्छा करते हैं, वे पूर्व दिशा से आ कर रात्रि की पूजा करने
वाले मुझे किसी प्रकार हिंसित न करें. वे शत्रु अपने विनाश के लिए वसु नामक देवों वाली
अग्नि के पास जाएं. (१)
वायुं ते ३ न्तरिक्षवन्तमृच्छन्तु. ये माघायव एतस्या दिशो ऽ भिदासात्..
(२)
दूसरों की हिंसा करने के इच्छुक जो शत्रु पूर्व दिशा से आ कर रात्रि की पूजा करने वाले
मेरी हिंसा करें, वे शत्रु अपने विनाश के लिए अंतरिक्ष अधिष्ठान वाली वायु को प्राप्त हों. (२)
सोमं ते रुद्रवन्तमृच्छन्तु. ये माघा ऽ यवो दक्षिणाया दिशो ऽ भिदासात्..
(३)
दूसरों की हिंसा करने के इच्छुक जो शत्रु दक्षिण दिशा से आ कर रात्रि की पूजा करने
वाले मेरी हिंसा करें, वे शत्रु अपने विनाश के लिए रुद्रों का सहयोग प्राप्त करने वाले सोम को
प्राप्त हों. (३)
वरुणं त आदित्यवन्तमृच्छन्तु. ये माघायव एतस्या दिशो ऽ भिदासात्..
(४)
जो दूसरों की हिंसा करने की इच्छा वाले शत्रु हैं, वे दक्षिण दिशा में आ कर रात्रि की
पूजा करने वाले मेरी हिंसा करें. वे अपने विनाश के लिए आदित्यों का सहयोग प्राप्त करने
वाले वरुण को प्राप्त हों. (४)
सूर्यं ते द्यावापृथिवीवन्तमृच्छन्तु. ये माघायव प्रतीच्या दिशो ऽ भिदासात्..
(५)
दूसरों की हिंसा करने के इच्छुक जो शत्रु हैं, वे पश्चिम दिशा से आ कर रात्रि की पूजा
करने वाले मेरी हिंसा करें, वे अपने विनाश के लिए द्यावा पृथ्वी का सहयोग प्राप्त करने वाले
सूर्य को प्राप्त हों. (५)
अपस्त ओषधीमतीर्ऋच्छन्तु. ये माघायव एतस्या दिशो ऽ भिदासात्.. (६)
दूसरों की हिंसा करने के इच्छुक जो शत्रु हैं, वे पश्चिम दिशा से आ कर रात्रि की
उपासना करने वाले मेरी हिंसा करें, वे अपने विनाश की ओषधियों अर्थात् जड़ीबूटियों का
सहयोग प्राप्त करने वाले जलों को प्राप्त हों. (६)
विश्वकर्माणं ते सप्तऋषिवन्तमृच्छन्तु.
ebook converter DEMO Watermarks*