अथर्ववेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)
Atharvaveda Samhita with Hindi Translation
by डा. गंगा सहाय शर्मा
Source: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (origin)
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Read in contextउद्देश्य से घृत, क्षीर आदि से युक्त हवि की अग्नि में आहुति देता हूं. (१)
शंतं त आपो धन्वन्त्या ३: शं ते सन्तन्त्वनूप्याः
शं ते खनित्रिमा आपः शं याः कुम्भेभिराभृताः.. (२)
हे यजमान! मरुस्थल के जल तथा जल वाले प्रदेश के जल तेरे लिए कल्याणकारी हों.
कुएं, तालाब आदि के जल तुझे सुख देने वाले बनें. घड़ों के द्वारा लाए गए जल भी तेरा
कल्याण करें. (२)
अनभ्रयः खनमाना विप्रा गम्भीरे अपसः.
भिषग्भ्यो भिषक्तरा आपो अच्छा वदामसि.. (३)
खोदने के साधनों में कुदाल आदि से रहित एवं लकड़ी, हाथों और पैरों से खोदने में
समर्थ एवं असाध्य कर्मों को भी मंत्र के बल से सिद्ध करने वाले हम मेधावी ब्राह्मण वैद्यों से
बढ़ कर वैद्य हैं. हम जलों की वंदना करते हैं. (३)
अपामह दिव्यानामपां स्रोतस्यानाम्.
अपामह प्रणेजने ऽ श्वा भवथ वाजिनः.. (४)
हे ऋत्विजो! तुम आकाश से बरसने वाले, नदियों में बहने वाले तथा अन्य प्रकार के
जलों और तेज दौड़ने वाले घोड़ों के समान इस जल शक्ति वाले यज्ञ कर्म में शीघ्रता करने
वाले बनो. (४)
ता अपः शिवा अपो ऽ यक्ष्मंकरणीरपः.
यथैव तृप्यते मयस्तास्त आ दत्त भेषजीः.. (५)
हे ऋत्विजो! प्रसिद्ध, कल्याण करने वाले तथा यक्ष्मा आदि रोगों से छुटकारा दिलाने
वाले ओषधि रूप जलों को मेरे सुख की वृद्धि के लिए यहां ले आओ. (५)
सूक्त-३ देवता—अग्नि
दिवस्पृथिव्याः पर्यन्तरिक्षाद् वनस्पतिभ्यो अध्योषधीभ्यः.
यत्रयत्र विभृतो जातवेदास्तत स्तुतो जुषमाणो न एहि.. (१)
हे अग्नि देव! आकाश से पृथ्वी से अंतरिक्ष से, वनस्पतियों से, ओषधियों से तथा
जहांजहां तुम विशेष रूप से पूर्ण हो, वहांवहां से हमें प्रसन्न करते हुए यहां आओ. (१)
यस्ते अप्सु महिमा यो वनेषु य ओषधीषु पशुष्वप्स्व१न्तः.
अग्ने सर्वास्तन्व १: सं रभस्व ताभिर्न एहि द्रविणोदा अजस्रः.. (२)
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