अथर्ववेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)
Atharvaveda Samhita with Hindi Translation
by डा. गंगा सहाय शर्मा
Source: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (origin)
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Read in contextउन्नीसवां कांड
सूक्त पहला देवता—यज्ञ
सं सं स्रवन्तु नद्य १: सं वाता: सं पतत्रिण:.
यज्ञमिमं वर्धयता गिर: संस्राव्येण हविषा जुहोमि.. (१)
नाद करती हुई सरिताएं भलीभांति प्रवाहित हों. वायु हमारे अनुकूल बहे. पक्षी आदि
सभी प्राणी हमारे अनुकूल आचरण करें. हे स्तुति किए जाते हुए देवो! जिस यजमान के
निमित्त यह यज्ञ रूप शांति कर्म किया जा रहा है, तुम पुत्र, पशु आदि से उस की वृद्धि करो.
मैं आप देवों के उद्देश्य से घृत, क्षीर आदि से युक्त हवि की अग्नि में आहुति देता हूं. (१)
इमं होमा यज्ञमवतेमं संस्रावणा उत.
यज्ञमिमं वर्धयता गिर: संस्राव्येण हविषा जुहोमि.. (२)
हे आहुतियो! तुम इस यज्ञ की रक्षा करो. हे घृत, क्षीर आदि! तुम इस यज्ञ का पालन
करो. हे देवो! फल की कामना वाले इस यजमान की रक्षा करो. इस यजमान की पुत्र, पशु
आदि से वृद्धि करो. मैं आप देवों के उद्देश्य से घृत, क्षीर आदि से युक्त हवि की अग्नि में
आहुति देता हूं. (२)
रूपंरूपं वयोवय: संरभ्यैनं परि ष्वजे.
यज्ञमिमं चतस्र: प्रदिशो वर्धयन्तु संस्राव्येण हविषा जुहोमि.. (३)
मैं फल की कामना करने वाले तथा यज्ञ कर्म के प्रयोजक यजमान को पशु, पुत्र आदि
फलों से संबद्ध करता हूं. चारों दिशाएं एवं उन दिशाओं में निवास करने वाले जन इस
यजमान को अभिलषित फल प्रदान करें. मैं आप देवों के उद्देश्य से घृत, क्षीर आदि से युक्त
हवि की अग्नि में आहुति देता हूं. (३)
सूक्त-२ देवता—आप अर्थात् जल
शं त आपो हैमवती: शमु ते सन्तूत्स्या:.
शं ते सनिष्यदा आप: शमु ते सन्तु वर्ष्या:.. (१)
हे यजमान! हिमवान पर्वत से आए हुए जल, झरनों के जल तथा सदा बहने वाले जल
तेरे लिए सुख करने वाले हों. वर्षा के जल भी तेरा कल्याण करने वाले हों. मैं आप देवों के
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