अथर्ववेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)
Atharvaveda Samhita with Hindi Translation
by डा. गंगा सहाय शर्मा
Source: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (origin)
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Read in context(२६-२७)
द्रप्सश्चस्कन्द पृथिवीमनु द्यामिमं च योनिमनु यश्च पूर्वः.
समानं योनिमनु संचरन्तं द्रप्सं जुहोम्यनु सप्त होत्राः.. (२८)
सब को प्रसन्न करने वाला आदित्य सब से पहले का है. यह चराचर जगत् की कारण
रूप पृथ्वी पर और द्युलोक में विचरण करता रहता है. तात्पर्य यह है कि आदित्य इन दोनों में
व्याप्त है. सब की कारण बनी हुई पृथ्वी संचरण करते हुए हर्ष देने वाले आदित्य को मैं सात
होताओं द्वारा सभी दिशाओं में हवि प्रदान करता हूं. (२८)
शतधारं वायुमर्कं स्वर्विदं नृचक्षसस्ते अभि चक्षते रयिम्.
ये पृणन्ति प्र च यच्छन्ति सर्वदा ते दुहते दक्षिणां सप्तमातरम्.. (२९)
हे प्रेत! मनुष्यों को देखने वाले देवता टपकते हुए जल से युक्त वायु के वेग से चलते हुए
एवं स्वर्ग प्राप्त कराने वाले इस कुंभ को तेरे लिए धन के रूप में जानते हैं. तेरे गोत्र वाले तुझे
इस कुंभ के जल से तृप्त करते हैं. कुंभोदक अर्थात् घड़े का जल देने वाले तुझे सात माताओं
रूपी जल धारा की दक्षिणा सदा प्रदान करते हैं. (२९)
कोशं दुहन्ति कलशं चतुर्बिलमिडां धेनुं मधुमतीं स्वस्तये.
ऊर्जं मदन्तीमदितिं जनेष्वग्ने मा हिंसीः परमे व्योमन्.. (३०)
मनुष्यों के स्वभाव को जानने वाले बुद्धिमान मनुष्य अनेक प्रकार के दोनों के रूप में
पानी के समान बहाए जाने वाले, विचरण करते हुए और सुख देने वाले धन को प्राप्त करते
हैं. जो मनुष्य अपने को उस धन से सदा पूर्ण करते रहते हैं तथा उत्तम पात्र के लिए उस धन
का दान करते हैं, वे मनुष्य सात माताओं वाली दक्षिणा प्राप्त करते हैं. (३०)
एतत् ते देवः सविता वासो ददाति भर्तवे.
तत् त्वं यमस्य राज्ये वसानस्तार्प्यं चर.. (३१)
हे पुरुष! सवितादेव तुझे पहनने के लिए यह वस्त्र प्रदान करते हैं. तू इस तृप्ति देने वाले
वस्त्र को पहन कर यम के राज्य में विचरण कर. (३१)
धाना धेनुरभवद् वत्सो अस्यास्तिलोऽभवत्.
तां वै यमस्य राज्ये अक्षितामुप जीवति.. (३२)
हे प्रेत! मंत्रों के अनुसार दिए गए धान यमलोक में जा कर तृप्त करने वाली गाय बनते
हैं और तिल उस धन रूपी गाय का बछड़ा बनता है. प्रेत यम के राज्य में उन धानों से बनी
हुई गाय पर ही आश्रित होता हुआ जीवित रहता है. (३२)
एतास्ते असौ धेनवः कामदुघा भवन्तु.
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