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अथर्ववेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

अथर्ववेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

Atharvaveda Samhita with Hindi Translation

by डा. गंगा सहाय शर्मा

Source: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (origin)

DevanagariSanskritpublished1,063 pages

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सुखकारी शरीरों से यज्ञ करने वाले को स्वर्गलोक की ओर ले जाओ. यज्ञ करने वाले लोग
उस स्वर्ग में देवों के साथ आनंद का भोग करते हुए तृप्त होते हैं. (१०)
शमग्ने पश्चात् तप शं पुरस्ताच्छमुत्तराच्छमधरात् तपैसम्.
एकस्त्रेधा विहितो जातवेदः सम्यगेनं धेहि सुकृतामु लोके.. (११)
हे अग्नि! तुम पश्चिम, पूर्व, उत्तर, दक्षिण आदि दिशाओं से इस मृतक को सुखपूर्व भस्म
करो. तुम एक हो, पर यजमान ने तुम्हें तीन रूपों में स्थापित किया था. तुम इस यजमान को
श्रेष्ठ जनों के लोक में भलीभांति स्थापित करो. (११)
शमग्नयः समिद्धा आ रभन्तां प्राजापत्यं मेध्यं जातवेदसः.
शृतं कृण्वन्त इह माव चिक्षिपन्.. (१२)
विधिपूर्वक प्रकाशित की गई अग्नियां तथा उत्पन्न पदार्थों में वर्तमान अग्नियां प्रजापति
को देवता मानने वाले इस पवित्र यजमान को सुखपूर्वक यज्ञ कार्य के हेतु उत्सुक बनाएं. इस
लोक में वे अग्नियां यजमान को पूर्ण बनाएं तथा उसे यज्ञ कार्य से विमुख न होने दें. (१२)
यज्ञ एति विततः कल्पमान ईजानमभि लोकं स्वर्गम.
तमग्नयः सर्वहुतं जुषन्तां प्राजापत्यं मेध्यं जातवेदसः.
शृतं कृण्वन्त इह माव चिक्षिपन्.. (१३)
विस्तृत यज्ञ समर्थ हो कर यज्ञकर्ता को स्वर्गलोक में पहुंचाता है. सर्वस्व होम करने वाले
यज्ञकर्ता को अग्नियां संतुष्ट करें. इस लोक में वे अग्नियां यजमान को पूर्ण बनाएं. अग्नियां
यजमान को इस यज्ञ कार्य से विमुख न होने दें. (१३)
ईजानश्चितमारुक्षदग्निं नाकस्य पृष्ठाद् दिवमुत्पतिष्यन्.
तस्मै प्र भाति नभसो ज्योतिषीमान्त्स्वर्गः पन्थाः सुकृते देवयानः.. (१४)
स्वर्ग के ऊपर स्थित द्युलोक जाने की इच्छा करता हुआ यज्ञकर्ता पुरुष चयन की हुई
अग्नि को प्रकट करता है. अर्थात् प्रज्वलित करता है. उस उत्तम कर्म करने वाले यजमान के
लिए आकाश को प्रकाशित करने वाले जिस मार्ग से जाते हैं, उसी प्रकार का सुख देने वाला
मार्ग प्रकाशित होता है. (१४)
अग्निर्होताध्वर्युष्टे बृहस्पतिरिन्द्रो ब्रह्मा दक्षिणतस्ते अस्तु.
हुतो ऽ यं संस्थितो यज्ञ एति यत्र पूर्वमयनं हुतानाम्.. (१५)
हे प्रेत! तेरे पितृमेध यज्ञ में अग्नि होता बने, बृहस्पति अध्वर्यु का कार्य करे और इंद्र
ब्रह्मा हो. इस प्रकार पूर्ण किया हुआ यह यज्ञ पहले किए गए अनेक यज्ञों का स्थान प्राप्त
करता है. (१५)
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