अथर्ववेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)
Atharvaveda Samhita with Hindi Translation
by डा. गंगा सहाय शर्मा
Source: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (origin)
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Read in contextजाग्रद्दुःष्वप्न्यं स्वप्नेदुःष्वप्न्यम्.. (९)
अनागमिषमतो वरानवित्तेः संकल्पान्मुच्या द्रुहः पाशान्.. (१०)
हम जाग्रत अवस्था में जो दुःस्वप्न देखते हैं और सोते हुए जो दुःस्वप्न देखते हैं, उनके बुरे
फलों से तथा धनहीनता के अतीतकाल के संकल्पों से, न प्राप्त होने वाले उत्तम पदार्थों से
और न छूटने वाले द्रोहजनित पाशों से मुक्त हों. (९-१०)
तदमुष्मा अग्ने देवाः परा वहन्तु वध्रिर्यथासद विथुरो न साधुः.. (११)
हे अग्नि देव! सभी देव सभी प्रकार की उन आपत्तियों को हमारे शत्रुओं की ओर ले
जाएं, जिनके कारण हमारे शत्रु पौरुषहीन व्याधि और सज्जनों को प्राप्त होने वाले यज्ञ को न
पाकर अपयश भोगें. (११)
सूक्त-७ देवता—दुःस्वप्ननाशन
तेनैनं विध्याम्यभूत्यैनं विध्यामि निर्भूत्यैनं विध्यामि पराभूत्यैनं
विध्यामि ग्राह्यैनं विध्यामि तमसैनं विध्यामि.. (१)
मैं इस अर्थात् बुरे स्वप्न को अभिचार कर्म अर्थात् जादू Node/टोने से, दुर्गति से, दरिद्रता से
तथा रोग से विद्ध करता हूं. (१)
देवानामैनं घोरैः क्रूरैः प्रैषैरभिप्रेष्यामि.. (२)
मैं इस बुरे स्वप्न को देवताओं की भयंकर आज्ञाओं के सामने उपस्थित करता हूं. (२)
वैश्वानरस्यैनं दंष्ट्रयोरपि दधामि.. (३)
मैं इस बुरे स्वप्न को वैश्वानर अर्थात् अग्नि की दाढ़ों में डालता हूं. (३)
एवानेवाव सा गरत्.. (४)
वैश्वानर इस बुरे स्वप्न को निगल जाएं. (४)
यो ३ स्मान् द्वेष्टि तमात्मा द्वेष्टु यं वयं द्विष्मः स आत्मानं द्वेष्टु.. (५)
जो हम से द्वेष करता हो, उस से आत्मा द्वेष करे. जिस से हम द्वेष करते हैं, वह आत्मा
से द्वेष करे. (५)
निर्द्विषन्तं दिवो निः पृथिव्या निरन्तरिक्षाद् भजाम.. (६)
जो हम से द्वेष करता है, उसे हम आकाश, पृथ्वी और अंतरिक्ष से दूर भगाते हैं. (६)
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