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अथर्ववेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

अथर्ववेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

Atharvaveda Samhita with Hindi Translation

by डा. गंगा सहाय शर्मा

Source: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (origin)

DevanagariSanskritpublished1,063 pages

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Page 751

जिस के घर में ऐसा विद्वान् व्रतधारी अतिथि बन कर उस समय आए, जब अग्नियां
प्रदीप्त हो गई हों और अग्निहोम चल रहा हो तो गृहस्थ स्वयं उस के सामने जा कर कहे कि
हे व्रती! तुम आज्ञा दो, मैं हवन करूंगा. (१-२)
स चातिसृजेज्जुहुयान्न चातिसृजेन्न जुहुयात्.. (३)
अतिथि विद्वान् आज्ञा दे, तभी हवन करे. यदि वह आज्ञा न दे तो हवन न करे. (३)
स य एवं विदुषा व्रात्येनातिसृष्टो जुहोति.. (४)
प्र पितृयाणं पन्थां जानाति प्र देवयानम्.. (५)
जो इस प्रकार के विद्वान् व्रतधारी की आज्ञा से हवन करता है, वह पितृयान और
देवयान मार्ग पर जाता है. (४-५)
न देवेष्वा वृश्चते हुतमस्य भवति.. (६)
पर्यस्यास्मिंल्लोक आयतनं शिष्यते य एवं विदुषा व्रात्येनातिसृष्टो जुहोति..
(७)
जो इस प्रकार के विद्वान् व्रतधारी की आज्ञा से हवन करता है, उस का अग्नि होम
सफल होता है तथा देवों इस का कोई दोष नहीं होता. इस लोक के उस गृहस्थ का आश्रम
सुरक्षित रहता है. (६-७)
अथ य एवं विदुषा व्रात्येनानतिसृष्टो जुहोति.. (८)
न पितृयाणं पन्थां जानाति न देवयानम्.. (९)
जो इस प्रकार के विद्वान् व्रतधारी की आज्ञा के बिना हवन करता है, वह न पितृयान
मार्ग को जानता है और न देवयान मार्ग का उसे ज्ञान होता है. (८-९)
आ देवेषु वृश्चते अहुतमस्य भवति.. (१०)
उस का हवन विफल होता है और वह देवों का अपराधी होता है. (१०)
नास्यास्मिंल्लोक आयतनं शिष्यते य एवं विदुषा व्रात्येनानतिसृष्टो
जुहोति.. (११)
इस लोक में उस का आधार नहीं रहता, जो ऐसे विद्वान् की आज्ञा के बिना हवन करता
है. (११)
सूक्त-१३ देवता—अध्यात्म, व्रात्य
तद् यस्यैवं विद्वान् व्रात्य एकां रात्रिमतिथिर्गृहे वसति.. (१)
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