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अथर्ववेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

अथर्ववेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

Atharvaveda Samhita with Hindi Translation

by डा. गंगा सहाय शर्मा

Source: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (origin)

DevanagariSanskritpublished1,063 pages

Page 750 of 1063

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Page 750

है. (४)
यदेनमाह व्रात्य तर्पयन्विति प्राणमेव तेन वर्षीयांसं कुरुते.. (५)
यह कहने वाला कि हमारे व्यक्ति तुम्हें तृप्त करें, अपने ही प्राणों को सींचता है. (५)
यदेनमाह व्रात्य यथा ते प्रियं तथास्त्विति प्रियमेव तेनाव रुन्द्धे.. (६)
ऐसा जानने वाला व्यक्ति प्रिय पुरुष को प्राप्त होता हुआ प्रिय पुरुष का भी प्रिय हो
जाता है. (६)
ऐनं प्रियं गच्छति प्रियः प्रियस्य भवति य एवं वेद.. (७)
यह कहने वाला कि जैसा तुम्हारा वक्ष है वैसा ही हो, अपने हेतु वक्ष को खोल लेता है.
(७)
यदेनमाह व्रात्य यथा ते वशस्तथास्त्विति वशमेव तेनाव रुन्द्धे.. (८)
यह कहने वाला कि जैसा तुम्हारी इच्छा है, वैसा ही हो, अपने लिए इच्छाओं को ही
खोल लेता है. (८)
ऐनं वशो गच्छति वशी वशिनां भवति य एवं वेद.. (९)
इस बात को जानने वाला वश को प्राप्त करता है. वह वश में करने वालों को भी वश में
कर लेता है. (९)
यदेनमाह व्रात्य यथा ते निकामस्तथास्त्विति निकाममेव तेनाव रुन्द्धे..
(१०)
यह कहने वाला कि तुम्हारा निवास जैसा है, वैसा ही हो, अपने लिए कामनाओं का द्वार
खोल लेता है. (१०)
ऐनं निकामो गच्छति निकामे निकामस्य भवति य एवं वेद.. (११)
इस प्रकार जानने वाला अभीष्ट को प्राप्त करता है. (११)
सूक्त-१२ देवता—अध्यात्म, व्रात्य
तद् यस्यैवं विद्वान् व्रात्य उद्धृतेष्वग्निष्वाधिश्रिते ऽ ग्निहोत्रे ऽ
तिथिर्गृहानागच्छेत्.. (१)
स्वयमेनमभ्युदेत्य ब्रूयाद् व्रात्याति सृज होष्यामीति.. (२)
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