अथर्ववेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)
Atharvaveda Samhita with Hindi Translation
by डा. गंगा सहाय शर्मा
Source: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (origin)
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Read in contextनीलेनैवाप्रियं भ्रातृव्यं प्रोर्णोति लोहितेन द्विषन्तं विध्यतीति ब्रह्मवादिनो
वदन्ति.. (८)
वह नीले भाग से अप्रिय शत्रु को घेरता है तथा अपने लाल भाग से द्वेष करने वालों को
वेधता है. ऐसा ब्रह्मवादी जन कहते हैं. (८)
सूक्त-२ देवता—अध्यात्म, व्रात्य
स उदतिष्ठत् स प्राचीं दिशमनुव्यचलत्.. (१)
वह उठ कर पूर्व दिशा में चल दिया. (१)
तं बृहच्च रथन्तरं चादित्याश्च विश्वे च देवा अनुव्य चलन्.. (२)
बृहत् साम, रथंतर साम, सूर्य तथा सभी देवता उस के पीछेपीछे चले. (२)
बृहते च वै स रथन्तराय चादित्येभ्यश्च विश्वेभ्यश्च देवेभ्य आ वृश्चते य एवं
विद्वांसं व्रात्यमुपवदति.. (३)
उस का सत्कार करने वाला बृहत् साम, रथंतर, सूर्य और सब देवताओं की प्रिय पूर्व
दिशा में अपना प्रिय धाम बनाता है. (३)
बृहतश्च वै स रथन्तरस्य चादित्यानां च विश्वेषां च देवानां प्रियं धाम भवति
तस्य प्राच्यां दिशि.. (४)
जो ऐसे विद्वान् व्रतचारी को अपशब्द कहता है, वह बृहत्, रथंतर, आदित्य और विश्वे
देवों का अपराधी होता है. (४)
श्रद्धा पुंश्चली मित्रो मागधो विज्ञानं वासोऽहरुष्णीषं रात्री केशा हरितौ
प्रवर्त्तौ कल्मलिर्मणिः.. (५)
श्रद्धा पुंश्चली, मित्र अर्थात सूर्य स्तुति करने वाला, विज्ञान वस्त्र, दिन पगड़ी, रात्रि केश,
किरणें कुंडल तथा तारे मणि के समान होते हैं. (५)
भूतं च भविष्यच्च परिष्कन्दौ मनो विपथम्.. (६)
भूत और भविष्यत्—ये दोनों काल उस के रक्षक हैं तथा मन उस का युद्ध संबंधी रथ
है. (६)
मातरिश्वा च पवमानश्च विपथवाहौ वातः सारथी रेष्मा प्रतोदः.. (७)
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