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अथर्ववेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

अथर्ववेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

Atharvaveda Samhita with Hindi Translation

by डा. गंगा सहाय शर्मा

Source: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (origin)

DevanagariSanskritpublished1,063 pages

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Page 734

पंद्रहवां कांड
सूक्त-१ देवता—अध्यात्म, व्रात्य
व्रात्य आसीदीयमान एव स प्रजापतिं समैरयत्.. (१)
व्रात्य अर्थात् समूहों का हित करने वाला समूहपति सब का प्रेरक था. भग ने
प्रजापालक को उत्तम प्रेरणा दी. (१)
स प्रजापतिः सुवर्णमात्मन्नपश्यत् तत् प्राजनयत्.. (२)
उस प्रजापति ने आत्मा को उत्तम तेज से युक्त किया तथा उस ने सब को उत्पन्न किया.
(२)
तदेकमभवत् तल्ललाममभवत् तन्महदभवत् तज्ज्येष्ठमभवत् तद्
ब्रह्माभवत् तत् तपो ऽ भवत् तत् सत्यमभवत् तेन प्राजायत.. (३)
वह विलक्षण तथा विशाल हुआ. वह श्रेष्ठ ब्रह्म हुआ. वह तपाने वाला तथा सत्य हुआ.
उस के द्वारा यह विश्व प्रकट हुआ. (३)
सो ऽ वर्धत स महानभवत् स महादेवो ऽ भवत्.. (४)
वह वृद्धि को प्राप्त हुआ. वही महान और महादेव हुआ. (४)
स देवानामीशां पर्यैत् स ईशानो ऽ भवत्.. (५)
वह देवों का स्वामी एवं ईशान हुआ. (५)
स एकव्रात्यो ऽ भवत् स धनुऱादत्त तदेवेन्द्रधनुः.. (६)
वह एक व्रात्य अर्थात् समूहों का स्वामी हुआ. उस ने धनुष उठाया और वह इंद्रधनुष
बन गया. (६)
नीलमस्योदरं लोहितं पृष्ठम्.. (७)
उस का पेट नीला और पीठ लाल है. (७)
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