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अथर्ववेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

अथर्ववेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

Atharvaveda Samhita with Hindi Translation

by डा. गंगा सहाय शर्मा

Source: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (origin)

DevanagariSanskritpublished1,063 pages

Page 691 of 1063

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Page 691

यत् प्राङ् प्रत्यङ् स्वधया यासि शीभं नानारूपे अहनी कृर्षि मायया.
तदादित्य महि तत् ते महि श्रवो यदेको विश्वं परि भूम जायसे.. (३)
हे सूर्य देव! तुम अन्नमय स्वधा अर्थात् हवियों के साथ पूर्व और पश्चिम दिशाओं को
गमन करते हो. तुम अपने तेज से दिवस और रात्रि को भिन्नभिन्न रूपों वाला बनाते हो. हे सूर्य
देव! यह तुम्हारी बहुत बड़ी महिमा है, जो तुम अकेले पूरे संसार को प्रभावित करते हो. (३)
विपश्चितं तरणिं भ्राजमानं वहन्ति यं हरितः सप्त बह्वीः.
सुताद् यमत्रिर्दिवमुन्निनाय तं त्वा पश्यन्ति परियान्तमाजिम्.. (४)
सात तेजस्वी किरणें सूर्य के प्रकाश को प्रभावशाली बनाती हैं. ज्ञानीजन इस का महत्त्व
जानते हैं. ये सूर्य द्युलोक पर चढ़ कर अपना तेज सर्वत्र फैलाते हैं. (४)
मा त्वा दभन् परियान्तमाजिं स्वस्ति दुर्गाँ अति याहि शीभम्.
दिवं च सूर्य पृथिवीं च देवीमहोरात्रे विमिमानो यदेषि.. (५)
हे सूर्य देव! तुम आकाश और पृथ्वी पर दिन तथा रात्रि का निर्माण करते हुए विचरण
करते हो. तुम दुर्गम स्थलों का शीघ्र और सुखपूर्वक उल्लंघन करो. चारों ओर घूमने वाले तुम
को शत्रु वश में न कर सकें. (५)
स्वस्ति ते सूर्य चरसे रथाय येनोभावन्तौ परियासि सद्यः.
यं ते वहन्ति हरितो वहिष्ठाः शतमश्वा यदि वा सप्त बह्वीः.. (६)
हे सूर्य देव! तुम्हारा रथ सब का कल्याण करने वाला है. उस रथ के द्वारा तुम उदय से
अस्त तक विचरण करते हो. सात किरणों और अनंत प्रकाश तुम्हारे प्रभाव की वृद्धि कर रहे
हैं. (६)
सुखं सूर्य रथमंशुमन्तं स्योनं सुवह्निमधि तिष्ठ वाजिनम्.
यं ते वहन्ति हरितो वहिष्ठाः शतमश्वा यदि वा सप्त बह्वीः.. (७)
हे सूर्य देव! तुम अपने उस रथ पर बैठो जो अग्नि के समान ज्योति वाला तथा वेग से
चलने वाला है. तुम ने प्रकाश करने वाले सौ अथवा अधिक सात घोड़ों को अपने रथ में
जोड़ा है. (७)
सप्त सूर्यो हरितो यातवे रथे हिरण्यत्वचसो बृहतीरयुक्त.
अमोचि शुक्लो रजसः परस्ताद् विधूय देवस्तमो दिवमारुहत्.. (८)
सूर्य अपनी माया के लिए अपने रथ में सुनहरी त्वचा वाले तथा हरे रंग के सात घोड़ों
को जोड़ते हैं. वे अंधकार का विनाश करते हुए उन घोड़ों को छोड़ कर अपने लोक में चले
जाते हैं. (८)
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