अथर्ववेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)
Atharvaveda Samhita with Hindi Translation
by डा. गंगा सहाय शर्मा
Source: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (origin)
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Read in contextयश्च गां पदा स्फुरति प्रत्यङ् सूर्यं च मेहति.
तस्य वृश्चामि ते मूलं न च्छायां करवोऽपरम्.. (५६)
जो सूर्य की ओर मुंह कर के मूत्र का त्याग करता है तथा गौ को अपने पैर से छूता है, मैं
उस का मूल छिन्न करता हूं. मैं उस के ऊपर कभी छाया नहीं करता. (५६)
यो माभिच्छायमत्येषि मां चाग्निं चान्तरा.
तस्य वृश्चामि ते मूलं न च्छायां करवो ऽ परम्.. (५७)
जो मनुष्य मेरे और अग्नि के मध्य से हो कर निकलता है अथवा जो मेरी छाया को
लांघता है, मैं उस की जड़ काट दूंगा तथा उस के ऊपर कभी छाया नहीं करूंगा. (५७)
यो अद्य देव सूर्य त्वां च मां चान्तरायति.
दुष्वप्न्यं तस्मिंछमलं दुरितानि च मुज्महे.. (५८)
हे सूर्य देव! हमारे और आप के मध्य जो बाधक होना चाहता है, उसे में पाप, दुःस्वप्न
तथा दुष्कर्मों में स्थापित करता हूं. (५८)
मा प्र गाम पथो वयं मा यज्ञादिन्द्र सोमिनः. मान्त स्थुर्नो अरातयः.. (५९)
हे इंद्र देव! जिस यज्ञ विधि में सोम का प्रयोग होता है, हम उस पद्धति से पृथक् न
जाएं. हमारे देश में शत्रु न रहें. (५९)
यो यज्ञस्य प्रसाधनस्तन्तुर्देवेष्वाततः. तमाहुतमशीमहि.. (६०)
जो यज्ञ देवताओं में अधिक विस्तृत है, हम उस यज्ञ की वृद्धि करने वाले बनें. (६०)
सूक्त-२ देवता—अध्यात्म रोहित
उदस्य केतवो दिवि शुक्रा भ्राजन्त ईरते.
आदित्यस्य नृचक्षसां महिव्रतस्य मीढुषः.. (१)
महान कर्म करने वाले, सेचन करने वाले और समर्थ एवं साक्षी रूप सूर्य की निर्मल
रश्मियां आकाश में चमकती हैं और सूर्य को ऊपर उठाती हैं. (१)
दिशां प्रज्ञानां स्वरयन्तमर्चिषा सुपक्षमाशुं पतयन्तमर्णवे.
स्तवाम सूर्यं भुवनस्य गोपां यो रश्मिभिर्दिश आभाति सर्वाः.. (२)
हम ज्ञानमयी दिशाओं में अपने तेज से शब्द भरने वाले, सुंदर पंखों वाले, अपनी
रश्मियों से प्रकाश देने वाले तथा लोकों के रक्षक सूर्य की स्तुति करते हैं. (२)