अथर्ववेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)
Atharvaveda Samhita with Hindi Translation
by डा. गंगा सहाय शर्मा
Source: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (origin)
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Read in contextएताभिर्ऋग्भिर्भेदं तस्माद् वै स पराभवत्.. (४९)
क्रोधित देवताओं ने वशा से कहा कि इस यजमान ने हम को दान नहीं किया, यह दान
न करने वाला इसी कारण पराजित होता है. (४९)
उतैनां भेदो नाददाद् वशामिन्द्रेण याचित:.
तस्मात् तं देवा आगसो ऽ वृश्चन्नहमुत्तरे.. (५०)
इंद्र के प्रार्थना करने पर भी यदि वशा का दान न करे तो उस से इस पाप के कारण
देवता अहंकार व्याप्त कर के उसे मिटा देते हैं. (५०)
ये वशाया अदानाय वदन्ति परिरापिण:.
इन्द्रस्य मन्यवे जाल्मा आ वृश्चन्ते आचित्या.. (५१)
जो लोग वशा का दान न करने का परामर्श देते हैं, वे मूर्ख लोग इंद्र के कोप के कारण
स्वयं नष्ट हो जाते हैं. (५१)
ये गोपतिं पराणीयाथाहुर्र्मा ददा इति.
रुद्रस्यास्तां ते हेतिं परि यन्त्यचित्त्य.. (५२)
जो लोग वशा गौ के स्वामी से उस का दान न करने के लिए कहते हैं, वे मूर्ख इंद्र के
आयुध वज्र के लक्ष्य बनते हैं. (५२)
यदि हुतां यद्यहुताममा च पचते वशाम्.
देवान्त्सब्राह्मणानृत्व्वा जिह्मो लोकान्निर्र्ऋच्छति.. (५३)
हुत अर्थात् दान में दी गई या अहुत अर्थात् दान में न दी गई वशा का पालन करने वाला
देवता और ब्राह्मणों का अपमान करने वाला होता है. वह इस लोक में बुरी गति प्राप्त करता
है. (५३)
सूक्त-५ देवता—ब्रह्मगवी
श्रमेण तपसा सृष्टा ब्रह्मणा वित्तर्ते श्रिता.. (१)
तप के द्वारा विरचित तथा परब्रह्म में आश्रित इस धेनु को ब्राह्मण ने यम से प्राप्त किया
है. (१)
सत्येनावृता श्रिया प्रावृता यशसा परीवृता.. (२)
यह धेनु सत्य, संपत्ति और यश से परिपूर्ण है. (२)
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