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अथर्ववेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

अथर्ववेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

Atharvaveda Samhita with Hindi Translation

by डा. गंगा सहाय शर्मा

Source: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (origin)

DevanagariSanskritpublished1,063 pages

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इस कर्म में किसी प्रकार का हेरफेर नहीं है. इस का कोई अन्य आधार भी नहीं है. यह
अपने मित्रों के साथ मिल कर भी नहीं आता है. यह जो पूर्ण पात्र रखा गया है, वही पकाने
वाले को पुनः प्राप्त हो जाता है. (४८)
प्रियं प्रियाणं कुणवाम तमस्ते यन्तु यतमे द्विषन्ति.
धेनुरनड्‌वान् वयोवय आयदेव पौरुषेयमप मृत्युं नुदन्तु.. (४९)
हे यजमान! प्रिय से भी प्रिय फल वाले कर्म को भी हम तेरे लिए करते हैं. तेरे द्वेषी
पुरुष नरक के रूप अंधकार की करे. गौ, बैल, अन्न, आयु और पुरुषार्थ ये हमारे समीप आते
हुए अपमृत्यु आदि को दूर भगाएं. (४९)
समग्नयो विदुरन्यो अन्यं य ओषधीः सचते यश्च सिन्धून्.
यावन्तो देवा दिव्या ३ तपन्ति हिरण्यं ज्योतिः पचतो बभूव.. (५०)
ओषधियों का भक्षण करने वाले अग्नि तथा जलों के सेवन कर्ता अग्नि एकदूसरे को
जानते हैं. उन के अतिरिक्त अन्य अग्नि भी इस कर्म को जानते हैं. देवताओं के तप, सुवर्ण
तथा चमचमाते हुए अन्य पदार्थ पाक कर्म करने वाले को प्राप्त होते हैं. (५०)
एषा त्वचां पुरुषे सं बभूवानग्नाः सर्वे पशवो ये अन्ये.
क्षत्रेणात्मानं परि धापयाथो ऽ मोतं वासो मुखमोदनस्य.. (५१)
ये पशु चर्म से आच्छादित दिखाई पड़ते हैं. इन की त्वचा पहले पुरुष में थी. हे पति और
पत्नी! तुम अपने को क्षमा तेज से संपन्न करो तथा इस भात के मुख को ढक दो. (५१)
यदक्षेषु वदा यत् समित्यां यद्वा वदा अनृतं वित्तकाम्या.
समानं तन्तुमभि संवसानौ तस्मिन्सर्वं शमलं सादयाथः.. (५२)
द्यूत कर्म में अथवा युद्ध में धन प्राप्ति की अभिलाषा से तुम ने जो मिथ्या भाषण किया
है, समस्त तंतुओं से बने इस वस्त्र से ढकते हुए अग्नि में उस दोष को प्रविष्ट कर दो. (५२)
वर्षं वनुष्वापि गच्छ देवांस्त्वचो धूमं पर्युत्पातयासि.
विश्वव्यचा घृतपृष्ठो भविष्यन्सयोनिलोर्कमुप याह्येतम्.. (५३)
हे ओदन! तू फल की वर्षा करने वाला हो. तू देवताओं के पास जा कर अपनी त्वचा को
धुएं के समान उछालना. तू घृत पृष्ठ होता हुआ अनेक प्रकार से पूजित हो कर तथा समान
उत्पत्ति वाला बन कर इस पुरुष को स्वर्ग में प्राप्त हो. (५३)
तन्वं स्वर्गो बहुधा वि चक्रे यथा विद आत्मन्नन्यवर्णांम्.
अपाजैत् कृष्णां रुशतीं पुनानो या लोहिनी तां ते अग्नौ जुहोमि.. (५४)
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