Skip to content
SarvaKosh
अथर्ववेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

अथर्ववेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

Atharvaveda Samhita with Hindi Translation

by डा. गंगा सहाय शर्मा

Source: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (origin)

DevanagariSanskritpublished1,063 pages

Page 581 of 1063

Read in context
Page 581

हे पके हुए एवं हवन के योग्य भात! देव तुम्हारे समीप बैठें. तुम अग्नि के समीप से
निकल कर इन्हें प्रसन्न करो. दूध, दही, रूप, अमृत से पवित्र तुम ब्राह्मणों के पेट में बैठो.
अपनेअपने गोत्र और प्रवर को जानने वाले ये ब्राह्मण तुम्हें खा कर नष्ट न हों अर्थात् तुम इन
की हिंसा मत करना. (२५)
सोम राजन्तसंज्ञानमा वपैभ्यः सुब्राह्मणा यतमे त्वोपसीदान्.
ऋषीनार्षेयांस्तपसो ऽ धि जातान् ब्रह्मोदने सुहवा जोहवीमि.. (२६)
हे राजा सोम रूपी ब्रह्मोदन! इन खाने वाले ब्राह्मणों को उत्तम ज्ञान दो. इन में जो उत्तम
ब्राह्मण तुम्हारे समीप बैठे हैं, उन्हें भी उत्तम ज्ञान प्राप्त कराओ. तप से उत्पन्न एवं शोभन
आह्वान वाली पत्नी मैं ज्ञानी ऋषियों को ब्रह्मोदन के निमित्त बारबार बुलाती हूं. (२६)
शुद्धाः पूता योषितो यज्ञिया इमा ब्राह्मणां हस्तेषु प्रपृथक् सादयामि.
यत्काम इदमभिषिञ्चामि वो ऽ हमिन्द्रो मरुत्वान्तस ददादिदं मे.. (२७)
पाप रहित एवं अपने संसर्ग से अन्यों को भी पवित्र करने वाले एवं यज्ञ के योग्य इन
जलों को मैं धोने के प्रयोजन से ब्राह्मणों के हाथ में डालता हूं. हे जलो! मैं जिस अभिलाषा से
इस समय तुम्हें सब ओर छिड़कता हूं, मरुतों से मुक्त इंद्र मेरी वह कामना पूरी करें. (२७)
इदं मे ज्योतिरमृतं हिरण्यं पक्वं क्षेत्रात् कामदुघा म एषा.
इदं धनं नि दधे ब्राह्मणेपु कृण्वे पन्थां पितृषु यः स्वर्गः.. (२८)
यह स्वर्ण मेरे स्वर्ग के मार्ग की कभी न बुझने वाली ज्योति है. यह पकाया हुआ अन्न
मेरी कामधेनु है. मैं दक्षिणा के रूप में दिया जाता हुआ धन ब्राह्मणों में धारण करता हूं तथा
मेरे पिता, पितामह आदि के द्वारा अभिलषित जो स्वर्गलोक है, मैं उस का मार्ग बनाता हूं.
(२८)
अग्नौ तुषाना वप जातवेदसि परः कम्बूकां अप मृड्ढि दूरम्.
एतं शुश्रुम गृहराजस्य भागमथो विद्म निर्ऋतेर्भागधेयम्.. (२९)
हे ऋत्विज्! ब्रह्मोदन से अलग की गई भूसी को जातवेद अग्नि में डालो तथा कंबूकों
अर्थात् फलकणों को पैर से दूर मसल दो. इस कंबूक को मैं ने गृहपति अर्थात् वास्तु देवता
का भाग सुना है. इसे मैं पाप देवता निर्ऋति का भाग जानता हूं. (२९)
श्राम्यतः पचतो विद्धि सुन्वतः पन्थां स्वर्गमधि रोहयैनम्.
येन रोहात् परमापद्य यद् वय उत्तमं नाकं परमं व्योम.. (३०)
हे ब्रह्मोदन! इन दीक्षा रूप तप करने वालों को, ब्रह्मोदन पकाने वालों को एवं सोमरस
निचोड़ने वाले यजमानों को जानो तथा स्वर्ग के मार्ग पर स्थापित करो. उस मार्ग से चल कर
यजमान उत्तम एवं दुःख रहित स्वर्ग में स्थित हो. उत्तम पक्षी बाज के समान ये जिस प्रकार
ebook converter DEMO Watermarks*