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अथर्ववेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

अथर्ववेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

Atharvaveda Samhita with Hindi Translation

by डा. गंगा सहाय शर्मा

Source: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (origin)

DevanagariSanskritpublished1,063 pages

Page 580 of 1063

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Page 580

अमूंस्त आ दधामि प्रजया रेषयैनान् बलिहाराय मृडतान्मह्यमेव.. (२०)
हे यजमान! तेरे द्वारा किया जाता हुआ यह ब्रह्मौदनासव नाम का यज्ञ हजार शरीर
वाला, अमृतमयी सौ धाराओं से युक्त, देवों तक पहुंचाने वाला तथा पल के रूप में स्वर्ग प्राप्त
कराने वाला है. यह ब्रह्मौदन खाए जाने पर भी कभी समाप्त नहीं होता है. हे ब्रह्मौदन! मैं
अपने सजातीय पुरुषों को तेरे सामने खड़ा करता हूं. इन्हें पुत्र, सेवक आदि प्रजा के रूप में
मेरी अपेक्षा हीन बना. यह सब यज्ञ केवल तुझे ही सुखी और उत्तम बनाए. (२०)
उदेहि वेदिं प्रजया वर्धयैनां नुदस्व रक्षः प्रतरं धेह्येनाम्.
श्रिया समानानति सर्वान्त्स्यामाधस्पदं द्विषतस्पादयामि.. (२१)
हे पके हुए भात! अग्नि से उठ कर यज्ञ वेदी पर आओ. इस पत्नी को पुत्र, पौत्र रूपी
प्रजा के द्वारा बढ़ाओ. यज्ञ में विघ्न डालने वाले राक्षसों को इस स्थान से भगाओ तथा इस
पत्नी को उत्तम बनाने के लिए इस का पोषण करो. (२१)
अभ्यावर्तस्व पशुभिः सहैनां प्रत्यडेनां देवताभिः सहैधि.
मा त्वा प्रापच्छपथो मा ऽ भिचारः स्वे क्षेत्रे अनमीवा वि राज.. (२२)
हे यजमान एवं यजमान पत्नी! दूसरों के द्वारा किया हुआ आक्रोश तुम तक न पहुंचे.
दूसरों के द्वारा किया हुआ मारण संबंधी जादू टोना भी तुम्हें प्राप्त न हो. तुम इस स्थान में
निरोग हो कर निवास करो. हे ब्रह्मौदन! पत्नी, यजमान, आदि को गाएं, भैंसे आदि पशुओं के
साथ प्राप्त हों तथा तुम यज्ञ के योग्य इन देवों के साथ यजमान के सामने खड़े होओ. (२२)
ऋतेन तष्टा मनसा हितैषा ब्रह्मौदनस्य विहिता वेदिरग्रे.
अंसद्रीं शुद्रामुप धेहि नारि तत्रौदनं सादय दैवानाम्.. (२३)
ब्रह्मा ने इस वेदी का निर्माण किया. हिरण्यगर्भ ने इसे स्थापित किया एवं ब्रह्मौदन को
पकाने के लिए महर्षियों ने इस वेदी की कल्पना की. हे पत्नी! तू देवों, पितरों और मनुष्यों के
भागों को धारण करने वाली इस वेदी के समीप बैठ तथा देवों के इस भाग को पका. (२३)
अदितेर्हस्तां सुचमेतां द्वितीयां सप्तऋषयो भूतकृतो यामकृण्वन्.
सा गात्राणि विदुष्योदनस्य दर्विर्वेद्यामध्येनं चिनोतु.. (२४)
प्राणियों की सृष्टि करने वाले सप्त ऋषियों ने देव माता अदिति के द्वितीय हाथ के रूप
में होम के साधन इस करछुली को बनाया था. यह करछुली पके हुए भात के शरीरों को
जानती हुई वेदी के ऊपर इस भात को स्थापित करे. (२४)
शृतं त्वा हव्यमुप सीदन्तु दैवा निःसृप्याग्नेः पुनरेनान् प्र सीद.
सोमेन पूतो जठरे सीद ब्रह्मणामार्षेयास्ते मा रिषन् प्राशितारः.. (२५)
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