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अथर्ववेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

अथर्ववेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

Atharvaveda Samhita with Hindi Translation

by डा. गंगा सहाय शर्मा

Source: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (origin)

DevanagariSanskritpublished1,063 pages

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चालू रखें. (३)
परि वः सिकतावती धनूर्बृहत्यक्रमीत्.
तिष्ठतेलयता सु कम्.. (४)
हे पथरी रोग उत्पन्न करने वाली नाड़ी! हे धनु और बृहती नाड़ी! तुम रुधिर प्रवाह के
सभी मार्गों को चारों ओर से घेर कर फैली हुई हो. तुम रक्त स्राव रहित बनो तथा इस जन का
सुख बढ़ाओ. (४)
सूक्त-१८ देवता—सावित्री आदि
निर्लक्ष्म्यं ललाम्यं १ निररातिं सुवामसि.
अथ या भद्रा तानि नः प्रजाया अरातिं नयामसि.. (१)
हम ललाट के असौभाग्य सूचक चिह्न को शत्रु के समान अपने शरीर से दूर करते हैं. जो
सौभाग्य सूचक चिह्न हैं, वे हमारी संतान को प्राप्त हों. हम ने अपने शरीर से बुरे चिह्न दूर
किए हैं, वे हमारे शत्रुओं को प्राप्त हों. (१)
निररणिं सविता साविषक् पदोर्निहस्तयोर्वरुणो मित्रो अर्यमा.
निरस्मभ्यमनुमती रराणा प्रेमां देवा असाविषुः सौभाग्याय.. (२)
सब को प्रेरणा देने वाले सविता देव, वरुण देव, मित्र एवं अर्यमा देव हमारे हाथों और
पैरों में स्थित असौभाग्य सूचक लक्षणों को दूर कर दें. अनुमति देवी, ‘भय मत करो’, कहती
हुई हमारे शरीर में वर्तमान सभी बुरे लक्षणों को निकाल दें. इंद्र आदि देवों ने इस अनुमति
देवी को हमें सौभाग्य देने के लिए प्रेरित किया है. (२)
यत्त आत्मनि तन्वां घोरम् अस्ति यद्वा केशेषु प्रतिचक्षणे वा.
सर्वं तद् वाचाप हन्मो वयं देवस्त्वा सविता सूदयतु.. (३)
हे पुरुष! तेरे अपने शरीर, केशों एवं नेत्रों के जो बुरे लक्षण हैं, हम मंत्र रूपी वाणी से
उन सभी बुरे लक्षणों का विनाश करते हैं. सविता देव तुझे कल्याण की प्रेरणा दें. (३)
रिश्यपदीं वृषदतीं गोषेधां विधमामृत.
विलीढ्यं ललाम्यं १ ता अस्मन्नाशयामसि.. (४)
हम से संबंधित जो स्त्री हरिण के समान पैरों वाली, बैल के समान दांतों वाली, गाय के
समान गति वाली एवं विकृत शब्द बोलने वाली है; हम मंत्रों के प्रभाव से उस के इन दुर्लक्षणों
को दूर करते हैं. जिस स्त्री के माथे पर दुर्लक्षणों के प्रतीक उलटे रोम हैं, उन्हें भी हम अपने
मंत्रों के प्रभाव से दूर करते हैं. (४)
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