अथर्ववेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)
Atharvaveda Samhita with Hindi Translation
by डा. गंगा सहाय शर्मा
Source: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (origin)
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Read in contextहे ऊंचाई से नीचे की ओर गिरने वाले पर्जन्य! तुम्हारे लिए नमस्कार है. तुम्हारे
संतापकारी आयुध वज्र को नमस्कार है. हम आप के गुफा के समान अगम्य एवं उत्तम
निवास स्थान को जानते हैं. जिस प्रकार शरीर में नाभि मध्यस्थ है, उसी प्रकार तुम अंतरिक्ष
के केंद्र सागर में स्थित हो. (३)
यां त्वा देवा असृजन्त विश्व इषुं कृण्वाना असनाय धृष्णुम्.
सा नो मृड विदथे गृणाना तस्यै ते नमो अस्तु देवि.. (४)
हे अग्नि! सभी देवों के अप्रिय पुरुषों पर गिराने के लिए एवं शत्रुओं पर बाण के रूप में
फेंकने के लिए तुम्हारी रचना की गई है. यज्ञ में तुम्हारी स्तुति भी की जाती है. तुम हमारी
रक्षा करो. हे आकाश में चमकती हुई अग्नि! तुम्हारे लिए नमस्कार हो. (४)
सूक्त-१४ देवता—यम
भगमस्या वर्च आदिष्यधि वृक्षादिव स्रजम्.
महाबुध्न इव पर्वतो ज्योक् पितृष्वास्ताम्.. (१)
मनुष्य जिस प्रकार वृक्ष से माला बनाने हेतु फूल तोड़ता है, उसी प्रकार मैं इस स्त्री के
भाग्य और तेज को स्वीकार करता हूं. धरती में भीतर तक धंसा हुआ पर्वत जिस प्रकार स्थिर
रहता है, उसी प्रकार यह बुरे भाग्य वाली स्त्री चिरकाल तक पिता के घर रहे अर्थात् यह कभी
पति का मुख न देखे. (१)
एषा ते राजन् कन्या वधूर्नि धूयतां यम.
सा मातुर्बध्यतां गृहे ऽ थो भ्रातुरथो पितुः.. (२)
हे सुशोभित सोम! यह कन्या आप की पत्नी है, क्योंकि इस ने पहले आप को स्वीकार
किया है, इसलिए यह पतिगृह से निकाल दी जानी चाहिए. यह कन्या चिरकाल तक अपने
पिता एवं भाई के घर पड़ी रहे. (२)
एषा ते कुलपा राजन् तामु ते परि दद्मसि.
ज्योक् पितृष्वासाता आ शीर्षः शमोप्यात्.. (३)
हे सुशोभित सोम! यह स्त्री पतिव्रता होने के कारण आप के कुल का पालन करने वाली
है, इसलिए हम इसे रक्षा के लिए आप को देते हैं. यह तब तक अपने पिता के घर पर रहे. यह
धरती पर सिर गिरने तक अर्थात् मरण पर्यंत अपने पिता के घर रहे. (३)
असितस्य ते ब्रह्मणा कश्यपस्य गयस्य च.
अन्तःकोशमिव जामयो ऽ पि नह्यामि ते भगम्.. (४)
हे स्त्री! मैं तेरे भाग्य को असित, ब्रह्मा, कश्यप एवं गय ऋषियों के मंत्रों से इस प्रकार
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