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अथर्ववेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

अथर्ववेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

Atharvaveda Samhita with Hindi Translation

by डा. गंगा सहाय शर्मा

Source: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (origin)

DevanagariSanskritpublished1,063 pages

Page 53 of 1063

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Page 53

अङ्कान्त्समङ्कान् हविषा विधेम यो अग्रभीत् पर्वास्या ग्रभीता.. (२)
हे प्राणियों के प्रत्येक अंग में अपनी दीप्ति से वर्तमान सूर्य! हम तुम्हें नमस्कार करते हुए
चरु आदि से तुम्हारी उपासना करते हैं. हम तुम्हारे अनुचर एवं परिवार रूप देवों की भी हवि
से सेवा करते हैं. जिस ज्वर आदि रोग ने इस पुरुष के शरीर के अवयवों को जकड़ रखा है,
हम उस की निवृत्ति के लिए हवि द्वारा तुम्हारी पूजा करते हैं. (२)
मुञ्च शीर्षक्त्या उत कास एनं परुष्परूराविवेशा यो अस्य.
यो अभ्रजा वातजा यश्च शुष्मो वनस्पतीन्त्सचतां पर्वतांश्च.. (३)
हे सूर्य! इस पुरुष को सिर के रोग से छुटकारा दिलाओ. जो खांसी का रोग इस के
जोड़जोड़ में प्रवेश कर गया है, उस से भी इसे मुक्त कराओ. वर्षा एवं जल से उत्पन्न जो पित्त
के विकार से जनित आदि रोग हैं, उन से इस पुरुष को मुक्त कराइए. ये रोग इस पुरुष को
छोड़ कर वनस्पति और पर्वतों में चले जाएं. (३)
शं मे परस्मै गात्राय शमस्त्ववराय मे.
शं मे चतुर्भ्यो अङ्गेभ्यः शमस्तु तन्वे ३ मम.. (४)
मेरे शरीर के अवयव सिर का रोग शांति के रूप में कल्याणकारी हो. मेरे चरण आदि
निम्न अंगों को सुख मिले. मेरे दोनों हाथों और दोनों चरणों को सुख प्राप्त हो. मेरे शरीर के
मध्य भाग को नीरोगता प्राप्त हो. (४)
सूक्त-१३ देवता—विद्युत्
नमस्ते अस्तु विद्युते नमस्ते स्तनयित्नवे.
नमस्ते अस्त्वश्मने येना दूडाशे अस्यसि.. (१)
हे पर्जन्य! विद्युत को मेरा नमस्कार हो. गर्जन करते हुए वज्र को मेरा नमस्कार हो.
आप आततायियों को दूर फेंक देते हैं. (१)
नमस्ते प्रवतो नपाद् यतस्तपः समूहसि.
मृडया नस्तनूभ्यो मयस्तोकेभ्यस्कृधि.. (२)
हे पर्जन्य! आप सत्पुरुषों की रक्षा करते हैं. आप को नमस्कार है. आप जल को भीतर
धारण किए रहते हैं और समय से पहले नीचे नहीं गिरने देते हैं. आप पाप विनाशक तप को
एकत्र करते हैं एवं पापियों पर अपना वज्र फेंकते हैं. आप हमारे शरीर को सुख दें और हमारे
पुत्र, पौत्र आदि का कल्याण करें. (२)
प्रवतो नपान्नम एवास्तु तुभ्यं नमस्ते हेतये तपुषे च कृण्मः.
विद्म ते धाम परमं गुहा यत् समुद्रे अन्तर्निहितासि नाभिः.. (३)
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