अथर्ववेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)
Atharvaveda Samhita with Hindi Translation
by डा. गंगा सहाय शर्मा
Source: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (origin)
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Read in contextघर्मः समिद्धो अग्निनायं होमः सहस्रहः.
भवश्च पृश्निबाहुश्च शर्व सेनाममूं हतम्.. (१७)
धूप चढ़ी हुई है और यह होम अग्नि के कारण हजार गुना बढ़ चुका है. हे भव!
पृश्निबाहु और सर्व नामक देवो! इस शत्रु सेना का संहार करो. (१७)
मृत्योराषमा पद्यन्तां क्षुधं सेदिं वधं भयम्.
इन्द्रश्चाक्षुजालाभ्यां शर्व सेनाममूं हतम्.. (१८)
ये शत्रु भूख, दरिद्रता, वध और भय के कारण मृत्यु के मुख में चले जाएं. हे इंद्र और
शर्व अक्ष और जालों के द्वारा इस शत्रु सेना का संहार करो. (१८)
पराजिताः प्र त्रसतामित्रा नुत्ता धावत ब्रह्मणा.
बृहस्पतिप्रणुत्तानां मामीषां मोचि कश्चन.. (१९)
हे शत्रुओ! तुम हमारे मंत्र बल से पराजित, भयभीत एवं दलित हो कर यहां से भाग
जाओ. बृहस्पति के द्वारा मंत्र बल से प्रभावित इन में से एक भी न बचे. (१९)
अव पद्यन्तामेषामायुधानि मा शकन् प्रतिधामिषुम्.
अथैषां बहु बिभ्यतामिषवो घ्नन्तु मर्मणि.. (२०)
इन शत्रुओं के आयुध न उठ सकें. इन के हाथ बाण चलाने में समर्थ न हों. इन
अत्यधिक भयभीत शत्रुओं के मर्मस्थलों को हमारे बाण बींध दें. (२०)
सं क्रोशतामेनान् द्यावापृथिवी समन्तरिक्षं सह देवताभिः.
मा ज्ञातारं मा प्रतिष्ठां विदन्त मिथो विघ्नाना उप यन्तु मृत्युम्.. (२१)
छाया, पृथ्वी एवं आकाश सभी देवों के साथ इन शत्रुओं को शाप दें. ये शत्रु अथर्ववेद
के किसी विद्वान् का आश्रय न ले सकें और प्रतिष्ठा को प्राप्त न करें. ये एकदूसरे के प्रति
विद्वेष करते हुए मृत्यु को प्राप्त हों. (२१)
दिशश्चतस्रो ऽ श्वतर्यो देवरथस्य पुरोडाशाः शफा अन्तरिक्षमुद्धिः.
द्यावापृथिवी पक्षसी ऋतवो ऽ भीशवो ऽ न्तर्देशाः किंकरा वाक्
परिरथ्यम्.. (२२)
चारों दिशाएं, अग्नि देव के रथ की चार अश्वतरियां अर्थात् खच्चरियां हैं. यज्ञ का
पुरोडाश उन खच्चरियों का सुम है तथा अंतरिक्ष उन का निवास स्थान है. धरती और
आकाश के बीच का भाग बाण और वाणी उस रथ को हांकने वाला सारथी है. (२२)
संवत्सरो रथः परिवत्सरो रथोपोस्थो विराडीषाग्नी रथमुखम्.
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