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अथर्ववेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

अथर्ववेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

Atharvaveda Samhita with Hindi Translation

by डा. गंगा सहाय शर्मा

Source: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (origin)

DevanagariSanskritpublished1,063 pages

Page 454 of 1063

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Page 454

मृत्योर्ये अघला दूतास्तेभ्य एनान् प्रति नयामि बद्ध्वा.. (१०)
ये शत्रु मृत्यु के पाशों से बंध चुके हैं, इसलिए मैं इन्हें मृत्यु को देता हूं. मैं इन्हें बांध कर
मृत्यु के शक्तिशाली दूतों की ओर ले जाता हूं. (१०)
नयतामूनन् मृत्युदूता यमदूता अपोम्भत.
परः सहस्रा हन्यन्तां तणेढ्वेनान् मत्यं भवस्य.. (११)
हे मृत्यु दूतो! इन शत्रु सैनिकों को ले जाओ. हे यमदूतो! इन का विनाश करो. जिस
प्रकार तिनका तोड़ देते हैं, उसी प्रकार इन हजारों से अधिक राक्षसों का वध करो. (११)
साध्या एकं जालदण्डमुद्यत्य यन्त्वोजसा.
रुद्रा एकं वसव एकमादित्यैरेक उद्यतः.. (१२)
साध्य देवता जाल के एक डंडे को पकड़ कर शत्रुओं पर बल से आक्रमण कर रहे हैं.
जाल के शेष तीन डंडों में से एक को रुद्र ने, दूसरे को वसु ने और तीसरे को आदित्य ने उठा
लिया है. (१२)
विश्वे देवा उपरिष्टादुब्जन्तो यन्त्वोजसा.
मध्येन घ्नन्तो यन्तु सेनामङ्गिरसो महीम्.. (१३)
विश्वे देव अपने बल के द्वारा ऊपर से मारते हुए जाएं. अंगिरा के पुत्र सेना के मध्य भाग
का विनाश करते हुए जाएं. (१३)
वनस्पतीन् वानस्पत्यानोषधीरुत वीरुधः.
द्विपाच्चतुष्पादिष्णामि यथा सेनाममूं हनन्.. (१४)
मैं अपने मंत्र बल से वनस्पतियों को, वनस्पतियों से बनी हुई ओषधियों को, वृक्षों को,
दो चरणों वाले मनुष्यों को प्रेरित करता हूं, जिस से वे शत्रु सेना का विनाश कर सकें. (१४)
गन्धर्वाप्सरसः सर्पान् देवान् पुण्यजनान् पितॄन्.
दृष्टानदृष्टानिष्णामि यथा सेनाममूं हनन्.. (१५)
मैं गंधर्वों, अप्सराओं, सर्पों, देवों, पवित्रजनों, पितरों तथा देखे और बिना देखे हुए
प्राणियों को अपने मंत्र बल से प्रेरित करता हूं कि वे शत्रु सेना को मार डालें. (१५)
इम उप्ता मृत्युपाशा यानाक्रम्य न मुच्यसे.
अमुष्या हन्तु सेनाया इदं कूटं सहस्रशः.. (१६)
हे शत्रु! मैं ने ये मृत्युपाश फैला दिए हैं. तू इन को पार कर के छूट नहीं सकता. यह कूट
इस शत्रु सेना का हजारों की संख्या में संचार करे. (१६)
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