अथर्ववेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)
Atharvaveda Samhita with Hindi Translation
by डा. गंगा सहाय शर्मा
Source: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (origin)
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Read in contextयावतीषु मनुष्या भेषजं भिषजो विदुः.
तावतीर्विश्वभेषजीरा भरामि त्वामभि.. (२६)
हे रोगी पुरुष! वैद्य जितनी भी जड़ीबूटियों को ओषधि के रूप में जानते हैं, उन समस्त
जड़ीबूटियों को मैं तेरी चिकित्सा के लिए लाता हूं. (२६)
पुष्पवतीः प्रसूमतीः फलिनीरफला उत.
संमातर इव दुहामस्मा अरिष्टतातये... (२७)
फूलों वाली, अंकुर उत्पन्न करने वाली, फल वाली और बिना फल वाली जो जड़ीबूटियां
हैं, मैं इस रोगी पुरुष के कल्याण के लिए उन सब का प्रयोग इस प्रकार करता हूं, जिस प्रकार
माता बालक को दूध पिलाती है. (२७)
उत् त्वाहार्षं पञ्चशलादथो दशशलादुत.
अथो यमस्य पड्वीशाद् विश्वस्माद् देवकिल्बिषात्.. (२८)
हे रोगी पुरुष! मैं ने पंच शलाका एवं दस शलाका वाली, काठ के चरण बंधन से
यमराज के पाश से तथा सभी पापों से छुड़ा कर तुझे प्राप्त कर लिया है. (२८)
सूक्त-८ देवता—इंद्र
इन्द्रो मन्थतु मन्थिता शक्रः शूरः पुरंदरः.
यथा हनाम सेना अमित्राणां सहस्रशः.. (१)
शत्रुओं का दलन करने वाले, शक्तिशाली, वीर एवं विरोधियों के नगरों को उजाड़ने वाले
इंद्र इस यज्ञ में अरणि मंथन कर के अग्नि प्रज्वलित करें, जिस के प्रभाव से हम अपने शत्रुओं
की हजारों सैनिकों वाली सेनाओं का विनाश कर सकें. (१)
पूतिरज्जुरुपध्मानी पूतिं सेनां कृणोत्वमूम्.
धूममग्निं परादृश्या ऽ मित्रा हृत्स्वा दधतां भयम्.. (२)
अग्नि में गिरने वाली पुरानी रस्सी शत्रु की सेना को शक्तिहीन करे. इस यज्ञ अग्नि का
धुआं देख कर ही शत्रु भयभीत हों और अपना धन छोड़ कर भाग जाएं. (२)
अमूनश्वत्थ निः शृणीहि खादामून् खदिराजिरम्.
ताजद्भङ्गा इव भज्यन्तां हन्त्वेनान् वधको वधैः.. (३)
हे पीपल के वृक्ष! तुम इन शत्रुओं को समाप्त करो. हे खैर के वृक्ष तुम इन सभी
गमनशील शत्रुओं को खा डालो. शत्रु अरंडी के वृक्ष के समान टूट जाएं. तुम अपने काष्ठ के
प्रहार से इन का वध करो. (३)
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