अथर्ववेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)
Atharvaveda Samhita with Hindi Translation
by डा. गंगा सहाय शर्मा
Source: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (origin)
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Read in contextअश्वत्थो दर्भो वीरुधां सोमो राजा ऽ मृतं हविः.
व्रीहिर्यवश्च भेषजौ दिवस्पुत्रावमर्त्यौ.. (२०)
वृक्षों का गर्भ पीपल, राजा सोम और अमृत हवि हैं. धान और जौ नामक फसलें
आकाश से होने वाली वर्षा से उत्पन्न होने के कारण आकाश की संतान तथा अमर हैं. (२०)
उज्जिहीध्वे स्तनयत्यभिक्रन्दत्योषधीः.
यदा व पृश्निमातरः पर्जन्यो रेतसा ऽ वति.. (२१)
जड़ीबूटियां बिजली की कड़क से और बादलों के गर्जन से जीवित रहती हैं. वायु और
मेघ वर्षा रूपी जीवन से जड़ीबूटियों की रक्षा करते हैं. (२१)
तस्यामृतस्येमं बलं पुरुषं पाययामसि.
अथो कृणोमि भेषजं यथा ऽ सच्छतहायनः.. (२२)
जड़ीबूटियों के अमृत रूपी बल को मैं रोगी पुरुष को पिलाता हूं. मैं इस की चिकित्सा
इस प्रकार करता हूं कि यह रोगी पुरुष सौ वर्ष की अवस्था प्राप्त करे. (२२)
वराहो वेद वीरुधं नकुलो वेद भेषजीम्.
सर्पा गन्धर्वा या विदुस्ता अस्मा अवसे हुवे.. (२३)
सुअर जिन वृक्षों को जानता है और नेवला जिन जड़ीबूटियों से परिचित है तथा सांप
और गंधर्व जिन्हें जानते हैं, उन जड़ीबूटियों को मैं इस रोगी पुरुष की रक्षा के लिए बुलाता हूं.
(२३)
याः सुपर्णा आङ्गिरसीर्दिव्या या रघटो विदुः.
वयांसि हंसा या विदुर्याश्च सर्वे पतत्रिणः.
मृगा या विदुरोषधीस्ता अस्मा अवसे हुवे.. (२४)
जिन सुंदर पत्तों वाली जड़ीबूटियों का अंगिरा ऋषि ने रोगियों पर प्रयोग किया, रमद्रुट
जिन दिव्य जड़ीबूटियों को जानते थे, हंस एवं अन्य सभी पक्षी जिन जड़ीबूटियों से परिचित
हैं तथा हरिण जिन जड़ीबूटियों को जानते हैं, उन सभी जड़ीबूटियों को मैं इस रोगी पुरुष की
चिकित्सा के लिए बुलाता हूं. (२४)
यावतीनामोषधीनां गावः प्राश्नन्त्यघ्न्या यावतीनामजावयः.
तावतीस्तुभ्यमोषधीः शर्म यच्छन्त्वाभृताः.. (२५)
हे रोगी पुरुष! हिंसा के अयोग्य गाएं जितनी जड़ीबूटियों को खाती हैं और बकरियां या
भेड़ें जिन जड़ीबूटियों को चरती हैं, मेरे द्वारा लाई गई वे सभी जड़ीबूटियां तेरा कल्याण करें.
(२५)
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