अथर्ववेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)
Atharvaveda Samhita with Hindi Translation
by डा. गंगा सहाय शर्मा
Source: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (origin)
Page 420 of 1063
Read in contextआठवां कांड
सूक्त-१ देवता—आयु
अन्तकाय मृत्यवे नमः प्राणा अपाना इह ते रमन्ताम्.
इहायमस्तु पुरुषः सहासुना सूर्यस्य भागे अमृतस्य लोके.. (१)
सभी प्राणियों का विनाश करने वाले मृत्यु को नमस्कार है. हे ब्रह्मचारी! प्राण और
अपान वायु तेरे शरीर में रमण करें. यह पुरुष प्राणों से युक्त हो. यह सूर्य प्रदेश में, भूलोक में
एवं अमृतलोक में वर्तमान रहे. (१)
उदेनं भगो अग्रभीदुदेनं सोमो अंशुमान्.
उदेनं मरुतो देवा उदिन्द्राग्नी स्वस्तये.. (२)
भग नामक अदिति पुत्र ने इस मूर्च्छित पुरुष का उद्धार किया है. अमृतमयी किरणों से
सोम ने इस का उद्धार किया है. मरुत् देवों ने एवं अग्नि ने क्षेम के लिए इस का उद्धार किया
है. (२)
इह ते ऽ सुरिह प्राण इहायुरिह ते मनः.
उत् त्वा निर्ऋत्याः पाशेभ्यो दैव्या वाचा भरामसि.. (३)
हे आयु की कामना करने वाले पुरुष! तेरी प्राण वायु एवं चक्षु आदि इंद्रियां तेरे शरीर में
निवास करें. तेरी आयु एवं मन भी तेरे इसी शरीर में रहें. हम निर्ऋति नामक पाप देवता के
बंधनों से अपने मंत्रों द्वारा तेरा उद्धार करते हैं. (३)
उत् क्रामातः पुरुष माव पत्था मृत्योः पड्बीशमवमुञ्चमानः.
मा च्छित्था अस्माल्लोकादग्नेः सूर्यस्य संदृशः.. (४)
हे पुरुष! तू मृत्यु के उन पाशों से छूट जा एवं पतन से बच. मृत्युदेव के पाश तेरे पैरों को
बांधने वाले हैं. तू उन्हें काटता हुआ भूलोक से अलग मत हो. तू अग्नि और सूर्य का दर्शन
करने के लिए इस लोक में रह. (४)
तुभ्यं वातः पवतां मातरिश्वा तुभ्यं वर्षन्त्वमृतान्यापः.
सूर्यस्ते तन्वे ३ शं तपाति त्वां मृत्युर्दयतां मा प्र मेष्ठाः.. (५)
हे मरण के समीप पहुंचे हुए पुरुष! वायु तेरे सुख के लिए चले. जल तेरे लिए अमृत की
ebook converter DEMO Watermarks*