अथर्ववेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)
Atharvaveda Samhita with Hindi Translation
by डा. गंगा सहाय शर्मा
Source: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (origin)
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Read in contextप्रजापते न त्वदेतान्यन्यो विश्वा रूपाणि परिभूर्जजान.
यत्कामास्ते जुहुमस्तन्नो अस्तु वयं स्याम पतयो रयीणाम्.. (३)
हे प्रजापति! तुम्हारे अतिरिक्त कोई भी देव इस समय वर्तमान समस्त आकार के
प्राणियों में व्याप्त होने वाला नहीं है. हम जिस फल की कामना करते हुए तुम्हें हवि देते हैं,
हमें वह फल प्राप्त हो और हम धनों के स्वामी बनें. (३)
पौर्णमासी प्रथमा यज्ञियासीदह्नां रात्रीणामतिशर्वरेषु.
ये त्वां यज्ञैर्यज्ञिये अर्धयन्त्यमी ते नाके सुकृतः प्रविष्टाः.. (४)
पौर्णमासी दिनों और रात्रियों में यज्ञ के योग्य प्रमुख तिथि है. पौर्णमासी सभी रात्रियों
और सोम आदि हवियों में उत्तम है. हे यज्ञ के योग्य पौर्णमासी! जो दर्श, पौर्णमास आदि यज्ञों
के द्वारा तुम्हारी अर्चना करते हैं, वे शोभन कर्मों वाले यजमान स्वर्ग में स्थित होते हैं. (४)
सूक्त-८६ देवता—सावित्री
पूर्वापरं चरतो माययैतौ शिशू क्रीडन्तौ परि यातो ऽ र्णवम्.
विश्वान्यो भुवना विचष्ट ऋतूँरन्यो विदधज्जायसे नवः.. (१)
सूर्य और चंद्र आगेपीछे चलते हुए आकाश में साथसाथ गमन करते हैं. ये शिशु के रूप
में सागरों के पास जाते हैं. इन में से एक आदित्य अर्थात् सूर्य समस्त प्राणियों को देखता है
तथा दूसरा चंद्रमा ऋतुओं, मासों एवं पक्षों का निर्माण करता हुआ नवीन होता रहता है. (१)
नवोनवो भवसि जायमानो ऽ ह्नां केतुरुषामेष्यग्रम्.
भागं देवेभ्यो वि दधास्यायन् प्र चन्द्रमस्तिरसे दीर्घमायुः.. (२)
हे चंद्रमा! तू शुक्ल पक्ष की प्रतिपदा आदि तिथियों में उत्पन्न होता हुआ नवीन बनता है.
झंडे के समान दिनों का परिचय कराता हुआ तू रात्रियों के आगेआगे चलता है. हे चंद्रमा! इस
प्रकार ह्रास और वृद्धि के द्वारा पखवाड़े के अंत को प्राप्त हुआ तू हवि का विभाग करता है.
इस प्रकार तू दीर्घ आयु धारण करता है. (२)
सोमस्यांशो युधां पतेऽनूना नाम वा असि.
अनूनं दर्श मा कृधि प्रजया च धनेन च.. (३)
हे सोम अर्थात् चंद्रमा के अंश रूप पुत्र अर्थात् बुध एवं योद्धाओं के पालक! तुम सर्वदा
तेजस्वी हो, इसलिए हे द्रष्टव्य बुध! हवि के द्वारा तुम्हारी पूजा करने वाले मुझ को पुत्र आदि
प्रजा एवं धन से संपन्न बनाओ. (३)
दर्शो ऽ सि दर्शतो ऽ सि समग्रो ऽ सि समन्तः.
समग्रः समन्तो भूयासं गोभिरश्वैः प्रजया पशुभिर्गृहैर्धनेन.. (४)
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