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अथर्ववेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

अथर्ववेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

Atharvaveda Samhita with Hindi Translation

by डा. गंगा सहाय शर्मा

Source: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (origin)

DevanagariSanskritpublished1,063 pages

Page 374 of 1063

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Page 374

सूक्त-३० देवता—अग्नि, विष्णु
अग्नाविष्णू महि तद् वां महित्वं पाथो घृतस्य गुह्यस्य नाम.
दमेदमे सप्त रत्ना दधानौ प्रति वां जिह्वा घृतमा चरण्यत्.. (१)
हे अग्नि और विष्णु! तुम दोनों कहे जाते हुए माहात्म्यपूर्ण, महान गोपनीय, और
टपकने वाले घृत को पियो. अग्नि और विष्णु प्रत्येक यज्ञशाला में रत्न धारण करते हैं. तुम
दोनों की जिह्वा हवन में डाले गए घृत को सामने आ कर प्राप्त करे. (१)
अग्नाविष्णू महि धाम प्रियं वां वीथो घृतस्य गुह्या जुषाणौ.
दमेदमे सुष्टुत्या वावृधानौ प्रति वां जिह्वा घृतमुच्चरण्यात्.. (२)
हे अग्नि और विष्णु! तुम दोनों का तेज महान एवं सब को प्रसन्न करने वाला है. तुम
दोनों, घृत के चरु, पुरोडाश आदि रूपों का भक्षण करो. परस्पर प्रसन्न होते हुए तुम दोनों
सभी यजमानों के घरों में शोभन स्तुति से बढ़ते हुए अपनी जिह्वाओं से घृत का भक्षण करो.
(२)
सूक्त-३१ देवता—द्यावा, पृथ्वी, मित्र,
बृहस्पति
स्वाक्तं मे द्यावापृथिवी स्वाक्तं मित्रो अकरयम्.
स्वाक्तं मे ब्रह्मणस्पतिः स्वाक्तं सविता करत्.. (१)
धरती और आकाश मेरे यज्ञ के बलिदान वाले खंबे अर्थात् यूप को भलीभांति रंगें.
दिखाई देते हुए ये सूर्य यज्ञ के यूप को रंगें. मंत्र का पालन करने वाले देव मेरे यूप को रंगें. सब
के प्रेरक सविता देव इस यूप को रंगा हुआ बनाएं. (१)
सूक्त-३२ देवता—इंद्र
इन्द्रोतिभिर्बहुलाभिर्नो अद्य यावच्छ्रेष्ठाभिर्मघवञ्छूर जिन्व.
यो नो द्वेष्ट्यधरः सस्पदीष्ट यमु द्विष्मस्तमु प्राणो जहातु.. (१)
हे इंद्र! आज बहुत सी रक्षाओं अर्थात् रक्षा साधनों के द्वारा हमारा पालन करो. हे
धनवान एवं शौर्य संपन्न इंद्र! प्रशंसनीय रक्षा साधनों के द्वारा हमें पूर्णतया प्रसन्न करो. जो
शत्रु हम से द्वेष करते हैं, वे अधोमुख हो कर गिरें. जिस शत्रु से हम द्वेष करते हैं, उसे तुम्हारा
प्राण त्याग दे. (१)
सूक्त-३३ देवता—आयु
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