अथर्ववेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)
Atharvaveda Samhita with Hindi Translation
by डा. गंगा सहाय शर्मा
Source: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (origin)
Page 351 of 1063
Read in contextतेन मा भगिनं कृण्वप द्रान्त्वरातयः.. (२)
हे ओषधि! तुम जिस सौभाग्य प्रदान करने वाले देव से तेज प्राप्त कर के समीपवर्ती
वृक्षों का तिरस्कार करती हो, उसी सौभाग्य से मुझे सौभाग्यशाली बनाओ. हमारे शत्रु हम से
दूर चले जाएं और बुरी गति को प्राप्त हों. (२)
यो अन्धो यः पुनःसरो भगो वृक्षेष्वाहितः.
तेन मा भगिनं कृण्वप द्रान्त्वरातयः.. (३)
जो भग नामक देव, अंधे होने के कारण आगे चलने में असमर्थ हैं और मार्ग में स्थित
वृक्षों को नहीं छोड़ते हैं, हे ओषधि! मुझे उस भाग्य से भाग्यशाली बनाओ. हमारे शत्रु हम से
दूर चले जाएं और बुरी दशा को प्राप्त हों. (३)
सूक्त-१३० देवता—स्मर
रथजितां रथजितेयीनामप्सरसामयं स्मरः.
देवाः प्र हिणुत स्मरमसो मामनु शोचतु.. (१)
हे रथजिता अर्थात् माष नाम की जड़ीबूटी! अपने वाहन रथ से विश्व को जीतने वाली
एवं विशेष वैराग्य उत्पन्न करने वाली अप्सराओं से संबंधित स्मर अर्थात् कामदेव को दूर करो.
हे देव! उस कामदेव को इस नारी के समीप भेजो. मुझ से विमुख यह स्त्री कामदेव से पीड़ित
हो कर मेरी याद कर के दुःखी हो. (१)
असौ मे स्मरतादिति प्रियो मे स्मरतादिति.
देवाः प्र हिणुत स्मरमसो मामनु शोचतु.. (२)
यह पुरुष मेरा स्मरण करे तथा मेरे प्रति अनुराग पूर्ण हो कर मेरा स्मरण करे. हे देव!
इस के प्रति कामदेव को भेजो, जिस से यह मेरा स्मरण करे और मेरे स्मरण के कारण दुःखी
हो. (२)
यथा मम स्मरादसौ नामुष्याहं कदा चन.
देवाः प्र हिणुत स्मरमसो मामनु शोचतु.. (३)
जिस प्रकार यह दुष्टा स्त्री मेरा स्मरण करती है, उस प्रकार आर्त हो कर मैं कभी भी इस
स्त्री का स्मरण नहीं करता हूं. हे देवो! कामदेव को इस की ओर भेजो, जिस से यह मेरा
स्मरण करे और मेरे स्मरण के कारण दुख का अनुभव करे. (३)
उन्मादयत मरुत उदन्तरिक्ष मादय.
अग्न उन्मादया त्वमसौ मामनु शोचतु.. (४)
ebook converter DEMO Watermarks*