अथर्ववेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)
Atharvaveda Samhita with Hindi Translation
by डा. गंगा सहाय शर्मा
Source: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (origin)
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Read in contextयथेयं पृथिवी मही भूतानां गर्भमादधे.
एवा ते ध्रियतां गर्भो अनु सूतं सवितवे.. (१)
हे नारी! जिस प्रकार विशाल पृथ्वी प्राणियों के शरीर को धारण करती है, उसी प्रकार
तेरा गर्भ भी प्रसव के समय जन्म लेने के लिए स्थित रहे. (१)
यथेयं पृथिवी मही दाधारेमान् वनस्पतीन्.
एवा ते ध्रियतां गर्भो अनु सूतं सवितवे.. (२)
यह विशाल पृथ्वी जिस प्रकार वृक्षों को धारण करती है, उसी प्रकार तेरा गर्भ भी प्रसव
के समय जन्म लेने के हेतु स्थित रहे. (२)
यथेयं पृथिवी मही दाधार पर्वतान् गिरीन्.
एवा ते ध्रियतां गर्भो अनु सूतं सवितवे.. (३)
हे नारी! जिस प्रकार यह विशाल पृथ्वी पर्वतों को धारण करती है, उसी प्रकार तेरा गर्भ
भी प्रसव के समय जन्म लेने के लिए स्थित रहे. (३)
यथेयं पृथिवी मही दाधार विष्ठितं जगत्.
एवा ते ध्रियतां गर्भो अनु सूतं सवितवे.. (४)
हे नारी! यह विशाल पृथ्वी जिस प्रकार चराचर जगत् को धारण करती है. उसी प्रकार
तेरा गर्भ भी प्रसव के समय जन्म लेने के लिए स्थित रहे. (४)
सूक्त-१८ देवता—ईर्ष्या विनाशन
ईर्ष्याया ध्राजिं प्रथमां प्रथमस्या उतापराम्.
अग्निं हृदयं १ शोकं तं ते निर्वापयामसि.. (१)
हे ईर्ष्या करने वाले पुरुष! तेरी ईर्ष्यापूर्ण मति यह है कि इस स्त्री को कोई देख न ले.
इस मति को शांत करते हुए हम तेरे हृदय विदारक शोक एवं क्रोध को शांत करते हैं. (१)
यथा भूमिर्मृतमना मृतान्मृतमनस्तरा. यथोत मम्रुषो मन एवेष्योर्मृतं मनः..
(२)
सब प्राणियों से अधिष्ठित पृथ्वी शांत मन वाली और सब के शरीर से भी उदात्त मन
वाली होती है. जिस प्रकार मृत पुरुष का मन ईर्ष्या रहित होता है, उसी प्रकार स्त्री विषयक
ईर्ष्यायुक्त पुरुष का मन भी शांत हो जाए. (२)
अदो यत् ते हृदि श्रितं मनस्कं पतयिष्णुकम्.
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