अथर्ववेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)
Atharvaveda Samhita with Hindi Translation
by डा. गंगा सहाय शर्मा
Source: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (origin)
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Read in contextसबन्धुश्चासबन्धुश्च यो अस्माँ अभिदासति.
तेषां सा वृक्षाणामिवाहं भूयासमुत्तमः.. (२)
हमारे गोत्र वाला अथवा हमारे गोत्र से भिन्न जो शत्रु हमें क्षीण करना चाहता है, उन सब
में मैं उसी प्रकार उत्तम बनूं, जिस प्रकार तू सभी वृक्षों में श्रेष्ठ है. (२)
यथा सोम ओषधीनामुत्तमो हविषां कृतः.
तलाशा वृक्षाणामिवाहं भूयासमुत्तमः.. (३)
जिस प्रकार पुरोडाश के प्रयोग के लिए सोमलता सभी लताओं और वनस्पतियों में श्रेष्ठ
मानी जाती है, उसी प्रकार मैं अपने गोत्र वालों में श्रेष्ठ बनूं. (३)
सूक्त-१६ देवता—मंत्र में उक्त
आबयो अनाबयो रसस्त उग्र आबयो. आ ते करम्भमद्मसि.. (१)
हे रोग निवृत्ति के लिए खाई जाने वाली सरसों एवं न खाए जाने वाले सरसों के तने!
तेरा रस अर्थात् तेल रोग निवारण में सक्षम है. हे सरसों! हम तेरा करम्भ (साग) मंत्रों से युक्त
कर के खाते हैं. (१)
विहह्लो नाम ते पिता मदावती नाम ते माता.
स हि न त्वमसि यस्त्वमात्मानमावयः.. (२)
हे सरसों के साग! तेरा पिता विहह्वल तथा माता मदावती नाम की है. तू अपना साग
मनुष्यों को खाने के लिए दे देती है, इसलिए तू अपने मातापिता के समान नहीं रहती. (२)
तौविलिके ऽ वेलयावायमैलब ऐलयीत्. बभ्रुश्च बभ्रुकर्णश्चापेहि निराल..
(३)
हे तौविलिक नाम की पिशाची! तू रोगों का कारण है. तू हमारे रोग को पराजित कर के
लौटा दे. तेरे द्वारा होने वाला ऐलय नाम का नेत्र रोग दूर चला जाए. हे बभ्रु, बभ्रुवर्ण तथा
निराल नामक रोग! तुम इस पुरुष के शरीर से भाग जाओ. (३)
अलसालासि पूर्वा सिलाञ्जालास्युत्तरा. नीलागलसाला.. (४)
पौधों की मंजरी अलसाला प्रथम उत्पन्न होने के कारण पूर्व है और बाद में उत्पन्न होने
के कारण सिलांजाला उत्तरा है. नीलागलसाला इन के मध्य वाली है. (४)
सूक्त-१७ देवता—गर्भ बृंहण
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