अथर्ववेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)
Atharvaveda Samhita with Hindi Translation
by डा. गंगा सहाय शर्मा
Source: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (origin)
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Read in contextअदिति अपने पुत्रों और भ्राताओं के साथ हमारे रक्षक एवं शत्रुओं द्वारा अतिक्रमण रहित बल
की शीघ्र रक्षा करें. (१)
अंशो भगो वरुणो मित्रो अर्यमादितिः पान्तु मरुतः.
अप तस्य द्वेषो गमेदभिहुतो यावयच्छत्रुमन्तितम्.. (२)
अदिति और उन के भग, वरुण, मित्र और अर्यमा नामक पुत्र और उनचास मरुतों का
समूह मेरी रक्षा करें. इन का द्वेष कर्म हम से दूर चला जाए. तुम हम से द्वेष रखने वाले शत्रु
को हम से पृथक् करो. (२)
धिये समश्विना प्रावतं न उरुष्या ण उरुज्मन्नप्रयुच्छन्.
द्यौ ३ ष्पिप्रीयय दुच्छुना या.. (३)
हे अश्विनीकुमारो! अग्निहोत्र आदि उत्तम कर्म करने की सद्बुद्धि के लिए हमारी रक्षा
करो. हे विस्तीर्ण गमन वाले वायु देव! तुम प्रमाद न करते हुए हमारी रक्षा करो. हे पिता के
समान द्युलोक! कुत्ते के समान आक्रमण करने वाली पाप की देवी को हमारे पास से भगाओ.
(३)
सूक्त-५ देवता—अग्नि, इंद्र
उदेनमुत्तरं नयाग्ने घृतेनाहुत. समेनं वर्चसा सृज प्रजया च बहुं कृषि.. (१)
हे घृत के द्वारा बुलाए गए अग्नि देव! तुम इस यजमान को उत्तम पद प्राप्त कराओ.
उत्तम पद प्राप्त कराने के पश्चात तुम इस यजमान को शारीरिक तेज से युक्त करो तथा पुत्र,
पौत्र आदि से समृद्ध बनाओ. (१)
इन्द्रेमं प्रतरं कृषि सजातानामसद् वशी.
रायस्पोषण सं सृज जीवातवे जरसे नय.. (२)
हे इंद्र! इस यजमान की अतिशय वृद्धि करो. तुम्हारी कृपा से यह अपने बंधुओं के मध्य
सब को वश में करने वाला तथा स्वयं स्वतंत्र बने. तुम इसे धन संपन्न बनाओ तथा इस के
जीवन को वृद्धावस्था तक पहुंचाओ. (२)
यस्य कृण्मो हविर्गृहे तमग्ने वर्धया त्वम्.
तस्मै सोमो अधि ब्रवदयं च ब्रह्मणस्पतिः.. (३)
हे अग्नि देव! हम जिस यजमान के घर में यज्ञ कर रहे हैं, उस यजमान को तुम समृद्ध
बनाओ. सोम देव एवं ब्रह्मणस्पति देव इसे अपना कहें. (३)
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