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अथर्ववेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

अथर्ववेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

Atharvaveda Samhita with Hindi Translation

by डा. गंगा सहाय शर्मा

Source: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (origin)

DevanagariSanskritpublished1,063 pages

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Page 276

सोम इंद्र के शरीर में शक्ति उत्पादक के रूप में स्वयं पहुंच जाते हैं. हे महान इंद्र! सोम पान से
उत्तेजित हो कर हमें बाधा पहुंचाने वाले सैनिकों से युक्त एवं युद्ध करती हुई शत्रु सेनाओं का
विनाश करो. (२)
सुनोता सोमपाव्ने सोममिन्द्राय वज्रिणे. युवा जेतेशानः स पुरुष्टुतः.. (३)
हे अध्वर्युगण! सोमपान के लिए उत्सुक एवं हाथ में वज्र धारण करने वाले इंद्र के लिए
सोमरस निचोड़ो. वे इंद्र नित्य तरुण, विजयी, सारे संसार के समीप तथा बहुत से यजमानों
द्वारा प्रशंसित हैं. (३)
सूक्त-३ देवता—इंद्र, पूषा
पातं न इन्द्रापूषणादितिः पान्तु मरुतः.
अपां नपात् सिन्धवः सप्त पातन पातु नो विष्णुरुत द्यौः.. (१)
हे इंद्र और पूषादेव! हमारी रक्षा करो. देवमाता अदिति हमारी रक्षा करें. उनचास
मरुद्गण हमारी रक्षा करें. अपानपात अर्थात् जल को ईंधन बनाने वाले अग्नि देव एवं सात
सागर हमारी रक्षा करें. विष्णु एवं आकाश हमारी रक्षा करें. आह्वनीय अग्नि और अग्नि की
सुखकर तथा राक्षसों द्वारा दिए हुए दुःख से रक्षक किरणें हमारी रक्षा करें. (१)
पातां नो द्यावापृथिवी अभिष्टये पातु ग्रावा पातु सोमो नो अंहसः.
पातु नो देवी सुभगा सरस्वती पात्वग्निः शिवा ये अस्य पायवः.. (२)
द्यावा और पृथिवी अभिमत फल पाने के लिए हमारी रक्षा करें. सोमरस कुचलने का
पत्थर और सोमरस पाप से हमारी रक्षा करे. सौभाग्ययुक्त देवी सरस्वती हमारी रक्षा करे.
अग्नि हमारी रक्षा करे, जिनकी किरणें हमें पवित्र करती हैं. (२)
पातां नो देवाश्विना शुभस्पती उषासानक्तोत न उरुष्यताम्.
अपां नपादभिहुती गयस्य चिद् देव त्वष्ट्र्वर्धय सर्वतातये.. (३)
हे दानादि गुणयुक्त एवं दीप्त तेज वाले अश्विनीकुमारो! हे दिन और रात के अधिष्ठाता
देवो! हमारी रक्षा करो. अपानपात अर्थात् मेघों के जल को बढ़ाने वाले अग्नि राक्षस आदि
की हिंसा से हमें बचाएं. हे त्वष्टा देव! सभी फलों की प्राप्ति के लिए हमें बढ़ाओ. (३)
सूक्त-४ देवता—त्वष्टा
त्वष्टा मे दैव्यं वचः पर्जन्यो ब्रह्मणस्पतिः.
पुत्रैर्भ्रातृभिरदितिर्नु पातु नो दुष्टरं त्रायमाणं सहः.. (१)
त्वष्टा एवं ब्रह्मणस्पति अर्थात् इस मंत्र के अधिपतिदेव मेरे स्तुति लक्षण वचनों को सुनें.
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