अथर्ववेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)
Atharvaveda Samhita with Hindi Translation
by डा. गंगा सहाय शर्मा
Source: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (origin)
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Read in contextभक्षण करता है, वह पापी राजा जीवित नहीं रहता. (२)
आविष्टिाघविषा पृदाकूरिव चर्मणा.
सा ब्राह्मणस्य राजन्य तृष्टैषा गौरनाद्या.. (३)
ब्राह्मण की चर्म से ढकी हुई गाय केंचुली से ढकी हुई व्यानी सर्पिणी के समान है. हे
राजन्! यह भक्षण करने योग्य नहीं है. (३)
निर्वै क्षत्रं नयति हन्ति वर्चो ऽग्निरिव रब्धो वि दुनोति सर्वम्.
यो ब्राह्मणं मन्यते अन्नमेव स विषस्य पिबति तैमातस्य.. (४)
जो राजा ब्राह्मण के पदार्थों का भक्षण करता है, वह विष पीता है और अपना क्षात्र तेज
गवां देता है. जिस प्रकार क्रोध में भरे हुए अग्नि देव सब कुछ नष्ट कर देते हैं, उसी प्रकार
ब्राह्मण के पदार्थों को खाने योग्य समझने वाला राजा नष्ट हो जाता है. (४)
य एनं हन्ति मृदुं मन्यमानो देवपीयुर्धनकामो न चित्तात्.
सं तस्येन्द्रो हृदये ऽग्निमिन्ध उभे एनं द्विषो नभसी चरन्तम्.. (५)
ब्राह्मण को मृदु समझने वाला जो अज्ञानी उसे नष्ट करना चाहता है, वह देव हिंसक है.
इंद्र उस पापी के हृदय में अग्नि प्रज्वलित कर देते हैं और आकाश तथा पृथ्वी दोनों उस के
प्रति वैर भाव रखते हैं. (५)
न ब्राह्मणे हिंसितव्यो ३ ग्निः प्रियतनोरिव.
सोमो ह्यस्य दायाद इन्द्रो अस्याभिशस्तिपाः.. (६)
जिस प्रकार अपने शरीर को कोई नष्ट नहीं करना चाहता, उसी प्रकार अग्नि के समान
तेजस्वी ब्राह्मण का नाश भी नहीं करना चाहिए. सोम ब्राह्मण का संबंधी हैं और इंद्र ब्राह्मण
के शाप को पूर्ण करते हैं. (६)
शतापाष्ठां नि गिरति तां न शक्नोति निःखिदम्.
अन्नं यो ब्रह्मणं मल्वः स्वाद्व१द्मीति मन्यते.. (७)
जो पापी ब्राह्मण के अन्न को स्वादिष्ट समझ कर भक्षण करता है, वह पापी मानव
सैकड़ों विपत्तियों को निगलता है. (७)
जिह्वा ज्या भवति कुल्मलं वाङ्नाडीका दन्तास्तपसाभिदिग्धाः.
तेभिर्ब्रह्मा विध्यति देवपीयून हृदबलैर्धनुर्भिर्देवजूतैः.. (८)
ब्राह्मण की जीभ धनुष की प्रत्यंचा, वाणी धनुष की लकड़ी और तपस्या के कारण
पवित्र दांत तीर हैं. ब्राह्मण देवताओं से प्रेरित इन्हीं धनुष बाणों से देव हिंसकों को बींधता है.
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