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अथर्ववेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

अथर्ववेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

Atharvaveda Samhita with Hindi Translation

by डा. गंगा सहाय शर्मा

Source: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (origin)

DevanagariSanskritpublished1,063 pages

Page 198 of 1063

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Page 198

अकृत्तरुक् त्वया युजा वयं द्युमन्तं घोषं विजयाय कृण्मसि.. (४)
हे मन्यु! हमारे द्वारा स्तुत तुम अकेले ही बहुत से शत्रुओं का विनाश करने में समर्थ हो.
तुम सभी प्रजाओं में प्रवेश कर के उन्हें युद्ध के लिए प्रेरित करो. हे अविच्छिन्न दीप्ति वाले
मन्यु! तुम्हारी सहायता से हम विजय के लिए सिंहनाद के समान घोष करते हैं. (४)
विजेषकृदिन्द्र इवानवब्रवो ३ स्माकं मन्यो अधिया भवेह.
प्रियं ते नाम सहुरे गृणीमसि विद्या तमुत्सं यत आबभूथ.. (५)
हे मन्यु! विजय करने वाले तुम इंद्र के समान विजय के प्राचीन उपायों के बताने वाले
बन कर इस संग्राम में हमारा पालन करो. हे सहनशील मन्यु! हम तुम्हें प्रसन्न करने वाली
स्तुतियां बोल रहे हैं. जिस स्थान से तुम प्रकट होते हो, हम उस अमृत धारा वाले स्थान को
जानते हैं. (५)
आभूत्या सहजा वज्र सायक सहो बिभर्षि सहभूत उत्तरम्.
क्रत्वा नो मन्यो सह मेद्येधि महाधनस्य पुरुहूत संसृजि.. (६)
हे वज्र के समान अकुंठित शक्ति वाले! हे शत्रुओं का अंत करने वाले एवं शत्रुओं के
पराजय के साथ उत्पन्न मन्यु! तुम उत्तम बल धारण करते हो. तुम हमारे यज्ञ के साथ चिकने
बनो. हे बहुत से यजमानों द्वारा बुलाए गए मन्यु! धन प्राप्ति वाले संग्राम में हमारे सहायक
बनो. (६)
संसृष्टं धनमुभयं समाकृतमस्मभ्यं दत्तां वरुणश्च मन्युः.
भियो दधाना हृदयेषु शत्रवः पराजितासो अप नि लयन्ताम्.. (७)
वरुण और मन्यु अपना धन ला कर हमें दें. हमारे शत्रु हृदय में भय धारण करते हुए
पराजित हों तथा भयभीत हो कर भाग जाएं. (७)
सूक्त-३२ देवता—मन्यु
यस्ते मन्यो ऽ विधद् वज्र सायक सह ओजः पुष्यति विश्वमानुषक्.
साह्याम दासमार्यं त्वया युजा वयं सहस्कृतेन सहसा सहस्वता.. (१)
हे मन्यु! जो पुरुष तुम्हारी सेवा करता है, हे वज्र के समान अकुंठित शक्ति वाले एवं
शत्रुओं का अंत करने वाले! वह पुरुष नित्य शत्रुओं को पराजित करने वाला अपना बल
संपूर्ण रूप से बढ़ाता है. तुम बल उत्पन्न करने वाले, हराने वाले और शक्ति देने वाले हो.
तुम्हारी सहायता से हम असुरों एवं उन के शत्रु देवों को भी पराजित करें. (१)
मन्युरिन्द्रो मन्युरेवास देवो मन्युर्होता वरुणो जातवेदाः.
मन्युं विश ईडते मानुषीर्याः पाहि नो मन्यो तपसा सजोषाः.. (२)
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