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अथर्ववेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

अथर्ववेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

Atharvaveda Samhita with Hindi Translation

by डा. गंगा सहाय शर्मा

Source: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (origin)

DevanagariSanskritpublished1,063 pages

Page 197 of 1063

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Page 197

अहं सुवे पितरमस्य मूर्धन्मम योनिरप्स्व १ न्तः समुद्रे.
ततो वि तिष्ठे भुवनानि विश्वोतामूं द्यां वर्ष्मणोप स्पृशामि.. (७)
इस दिखाई देने वाले प्रपंच के ऊपरी भाग अर्थात् सत्यलोक में वर्तमान इस प्रपंच के
जनक को मैं जानती हूं. इस जगत् के कारण रूप मेरा उत्पत्ति स्थान सागर के जलों में स्थित
हैं. तेज का कारण होने से मैं भुवनों को प्रकाशित करती हूं. मैं इस देह से स्वर्ग का स्पर्श
करती हूं. (७)
अहमेव वात इव प्र वाम्यारभमाणा भुवनानि विश्वा.
परो दिवा पर एना पृथिव्यैतावत्ती महिम्ना सं बभूव.. (८)
सभी भूतों को कारण के रूप में उत्पन्न करती हुई मैं वायु के समान वर्तमान हूं. इस
आकाश और इस पृथ्वी से भिन्न रहने वाली मैं अपनी महिमा से इस प्रकार की हुई हूं. (८)
सूक्त-३१ देवता—मन्यु
त्वया मन्यो सरथमारुजन्तो हर्षमाणा हृषितासो मरुत्वन्.
तिग्मेषव आयुधा संशिशाना उप प्र यन्तु नरो अग्निरूपा:.. (१)
हे क्रोध के अभिमानी देव मन्यु! तेरे द्वारा रथ वाले शत्रु को पीड़ित करते हुए, प्रसन्न एवं
क्रोध में भरे, तेज बाणों वाले तथा आयुधों की धार तेज करते हुए हमारे मनुष्य तेरी कृपा से
वायु के समान वेग वाले एवं अग्नि के समान अपराजित बन कर शत्रु के पास जाएं. (१)
अग्निरिव मन्यो त्विषितः सहस्व सेनानीर्नः सहुरे हूत एधि.
हत्वाय शत्रून् वि भजस्व वेद ओजो मिमानो वि मृधो नुदस्व.. (२)
हे मन्यु! तुम आग के समान दीप्त हो कर शत्रुओं को पराजित करो. हे सहनशील मन्यु!
तुम हमारी सेना के सेनापति बन कर बुलाए जाने पर आओ और हमारे शत्रुओं को मार कर
उन का धन हमें प्रदान करो. तुम शक्ति का प्रदर्शन करते हुए संग्रामकारी शत्रुओं का वध
करो. (२)
सहस्व मन्यो अभिमातिमस्मै रुजन् मृणन् प्रमृणन् प्रेहि शत्रून्.
उग्रं ते पाजो नन्वा रुरुध्रे वशी वशं नयासा एकज त्वम्.. (३)
हे मन्यु! इस राजा के शत्रु की सेना के हाथी, घोड़े आदि को कुचलते हुए एवं नष्ट करते
हुए शत्रुओं को पराजित करने के लिए आओ. हे अधिक शक्तिशाली मन्यु! तुम्हारे बल को
कोई रोक नहीं सकता. हे बिना सहायक के कार्य करने वाले एवं सब को वश में करने वाले
मन्यु! तुम सभी जनों को स्वाधीन बनाते हो. (३)
एको बहूनामसि मन्य ईडिता विशंविशं युद्धाय सं शिशाधि.
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