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अथर्ववेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

अथर्ववेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

Atharvaveda Samhita with Hindi Translation

by डा. गंगा सहाय शर्मा

Source: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (origin)

DevanagariSanskritpublished1,063 pages

Page 193 of 1063

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Page 193

तिग्ममनीकं विदितं सहस्वन् मारुतं शर्धः पृतनासूग्रम्.
स्तौमि मरुतो नाथितो जोहवीमि ते नो मुञ्चन्त्वंहसः.. (७)
तीक्ष्ण समय बना हुआ प्रसिद्ध एवं पराजित करने वाला मरुतों का बल सेनाओं को
दुःसह होता है. उन्हीं मरुतों की मैं स्तुति करता हूं एवं उन्हें सुख प्राप्ति के लिए बुलाता हूं. वे
मुझे पाप से बचाएं. (७)
सूक्त-२८ देवता—भव, शर्व
भवाशर्वौ मन्वे वां तस्य वित्तं ययोर्वामिदं प्रदिशि यद् विरोचते.
यावस्येशाथे द्विपदो यौ चतुष्पदस्तौ नो मुञ्चतमंहसः.. (१)
हे भव और शर्व! मैं तुम्हारा महत्त्व जानता हूं. मेरे द्वारा कहा जाता हुआ अपना महत्त्व
तुम जानो. तुम दोनों के शासन में यह सारा विश्व प्रकाशित होता है. भव और शर्व शत्रुओं को
अपने वज्र से संयुक्त करते हैं, इस समय क्या उत्पन्न हुआ है, ऐसी खोज करने वाले राक्षसों
को भी अपने आयुध से मारो. जो भव और शर्व इस विश्व के दो पैरों वाले मनुष्यों और चार
पैरों वाले पशुओं के स्वामी हैं, वे हमें पाप से बचाएं. (१)
ययोरभ्यध्व उत यद् दूरे चिद् यौ विदिताविषुभृतामसिष्ठौ.
यावस्येशाथे द्विपदो यौ चतुष्पदस्तौ नो मुञ्चतमंहसः.. (२)
जिन भव और शर्व के मार्ग के समीप अथवा दूर जो कुछ भी है, वह उन्हीं के अधिकार
में है, जो भव और शर्व सब के द्वारा ज्ञात, वपुषधारी और बाण फेंकने में कुशल है, जो इस
संसार के दो पैरों वाले मनुष्य तथा चार पैरों वाले पशुओं के स्वामी हैं, वे हमें पाप से बचाएं.
(२)
सहस्राक्षौ वृत्रहणा हुवे ऽ हं दूरेगव्यूती स्तुवन्नेम्युग्रौ.
यावस्येशाथे द्विपदो यौ चतुष्पदस्तौ नो मुञ्चतमंहसः.. (३)
मैं हजार आंखों वाले वृत्र का व्रत करता हूं एवं दूर देश में वर्तमान भव और शर्व का
आह्वान करता हूं. मैं उन्हीं शक्तिशालीयों की प्रशंसा करता हूं जो भव और शर्व इस संसार के
दो पैरों वाले मनुष्यों और चार पैरों वाले पशुओं के स्वामी हैं, वे हमें पाप से बचाएं. (३)
यावारेभाथे बहु साकमग्रे प्र चेदसाष्टमभिभां जनेषु.
यावस्येशाथे द्विपदो यौ चतुष्पदस्तौ नो मुञ्चतमंहसः.. (४)
हे भव और शर्व! तुम ने सृष्टि के आदि में बहुत से प्राणियों के समूह का निर्माण किया
है. इस के पश्चात उन में वीर्य की पर्याप्त मात्रा में रचना कर, जो भव और शर्व इस विश्व के दो
पैरों वाले मनुष्यों और चार पैरों वाले पशुओं के स्वामी हैं, वे हमें पाप से छुड़ाएं. (४)
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