अथर्ववेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)
Atharvaveda Samhita with Hindi Translation
by डा. गंगा सहाय शर्मा
Source: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (origin)
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Read in contextमैं उनचास मरुतों का माहात्म्य जानता हूं. वे मरुत मुझे अपना कहें. अन्न के लाभ का
अवसर आने पर वे इस अन्न की मेरे लिए रक्षा करें. मैं घोड़ों की लगाम के समान संयमित
मरुतों को अपनी रक्षा के लिए बुलाता हूं. वे मुझे पाप से छुड़ाएं. (१)
उत्समक्षितं व्यचन्ति ये सदा य आसिञ्चन्ति रसमोषधीषु.
पुरो दधे मरुतः पृश्निमातृंस्ते नो मुञ्चन्त्वंहसः.. (२)
जो मरुत सदैव वर्षा की धाराओं से युक्त एवं विनाश रहित मेघ को आकाश में फैलाते हैं
तथा गेहूं, जौ, वृक्ष आदि में रस सींचते हैं. मध्यमा वाणी जिन की माता हैं, ऐसे मरुतों को मैं
अपने सामने रखता हूं. वे मुझे पाप से बचाएं. (२)
पयो धेनूनां रसमोषधीनां जवमर्वतां कवयो य इन्वथ.
शग्मा भवन्तु मरुतो नः स्योनास्ते नो मुञ्चन्त्वंहसः.. (३)
हे मरुतो! तुम क्रांतदर्शी हो कर गायों के दूध को, जड़ीबूटियों के रस को तथा घोड़ों के
वेग को बढ़ाते हो. सभी कार्य करने में समर्थ वे मरुत् हमारे लिए सुखकारी हों तथा हमें पाप
से बचाएं. (३)
अपः समुद्राद् दिवमुद् वहन्ति दिवस्पृथिवीमभि ये सृजन्ति.
ये अद्भििरीशाना मरुतश्चरन्ति ते नो मुञ्चन्त्वंहसः.. (४)
जो मरुत् सागर के जल को मेघों के द्वारा अंतरिक्ष में पहुंचाते हैं, इस के पश्चात उसी
जल को अंतरिक्ष से धरती पर छोड़ते हैं, उन्हीं जलों के स्वामी बन कर जो मरुत् विचरण
करते हैं, वे हमें पाप से छुड़ाएं. (४)
ये कीलालेन तर्पयन्ति ये घृतेन ये वा वयो मेदसा संसृजन्ति.
ये अद्भििरीशाना मरुतो वर्षयन्ति ते नो मुञ्चन्त्वंहसः.. (५)
मरुत् वर्षा से उत्पन्न अन्न के द्वारा एवं जलों के द्वारा जनों को तृप्त करते हैं. जो पक्षियों
को चरबी से युक्त करते हैं, जो मरुत् मेघों के ईश बन कर विचरण करते हैं, वे हमें पाप से
बचाएं. (५)
यदीदिदं मरुतो मारुतेन यदि देवा दैव्येनेद्गार.
यूयमीशिध्वे वसवस्तस्य निष्कृतेस्ते नो मुञ्चन्त्वंहसः.. (६)
हे मरुतो! यदि मेरा दुःख अथवा दुःख का कारण पाप मुझे मरुत् संबंधी अपराध के
कारण प्राप्त हुआ है, हे इंद्र आदि देवो! यदि मुझे यह दुःख देव संबंधी अपराध के कारण
प्राप्त हुआ है तो हे मरुतो! इस दुःख अथवा पाप को मिटाने में तुम समर्थ हो. तुम मुझे पाप
से छुड़ाओ. (६)
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