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अथर्ववेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

अथर्ववेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

Atharvaveda Samhita with Hindi Translation

by डा. गंगा सहाय शर्मा

Source: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (origin)

DevanagariSanskritpublished1,063 pages

Page 190 of 1063

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Page 190

अपेतो वायो सविता च दुष्कृतमप रक्षांसि शिमिदां च सेधतम्.
सं हू ३ र्जया सृजथः सं बलेन तौ नो मुञ्चतमंहसः.. (४)
हे वायु एवं सविता देव! तुम मेरे पाप को मुझ से दूर करो. उपद्रवकारी राक्षसों तथा
जलती हुई कृत्या राक्षसी को यहां से दूर भगाओ. तुम ऊर्जा और बल से मेरा सृजन करो तथा
मुझे पाप से बचाओ. (४)
रयिं मे पोषं सवितोत वायुस्तनू दक्षमा सुवतां सुशेवम्.
अयक्षमतातिं मह इह धत्तं तौ नो मुञ्चतमंहसः.. (५)
सविता और वायु मेरे लिए धन और पुष्टि को प्रेरित करें. ये दोनों मेरे शरीर में सुख एवं
बल प्रदान करें. इस यजमान के शरीर में ये दोनों रोगहीनता तथा तेज धारण करें और हमें
पाप से बचाएं. (५)
प्र सुमतिं सवितर्वाय ऊतये महस्वन्तं मत्सरं मादयाथः.
अर्वाग् वामस्य प्रवतो नि यच्छतं तौ नो मुञ्चतमंहसः.. (६)
हे सविता एवं वायु देव! हमारी रक्षा के लिए हमें उत्तम बुद्धि प्रदान करो तथा
दीप्तिशाली एवं मादक सोमरस को पी कर प्रसन्न बनो. तुम दोनों उत्तम धन को हमारी ओर
प्रेरित करो तथा हमें पाप से छुड़ाओ. (६)
उप श्रेष्ठा न आशिषो देवयोर्धामन्नस्थिरन्.
स्तौमि देवं सवितारं च वायुं तौ नो मुञ्चतमंहसः.. (७)
वायु और सविता देव के तेज के विषय में हमारी उत्तम एवं फलदायक प्रार्थनाएं
उपस्थित हैं. हम धन आदि गुणों से युक्त वायु एवं सविता देव की स्तुति करते हैं. ये दोनों हमें
पाप से छुड़ाएं. (७)
सूक्त-२६ देवता—द्यावा, पृथिवी
मन्वे वां द्यावापृथिवी सुभोजसौ सचेतसौ ये अप्रथेथाममिता योजनानि.
प्रतिष्ठे ह्यभवतं वसूनां ते नो मुञ्चतमंहसः.. (१)
हे द्यावा पृथ्वी! तुम दोनों शोभन भोगों वाले एवं समान चित्त वाले हो. मैं तुम्हारी स्तुति
करता हूं. तुम दोनों अनंत योजन विस्तार वाले हो. तुम दोनों निवास करने वाले देव मनुष्यों
अथवा धनों के उत्तम स्थान बनते हों. तुम दोनों हमें पाप से छुड़ाओ. (१)
प्रतिष्ठे ह्यभवतं वसूनां प्रवृद्धे देवी सुभगे ऊरूची.
द्यावापृथिवी भवतं मे स्योने ते नो मुञ्चतमंहसः.. (२)