Skip to content
SarvaKosh
अथर्ववेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

अथर्ववेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

Atharvaveda Samhita with Hindi Translation

by डा. गंगा सहाय शर्मा

Source: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (origin)

DevanagariSanskritpublished1,063 pages

Page 189 of 1063

Read in context
Page 189

को पणियों द्वारा चुराई गई गायों की खोज के लिए बुलाया जाता है तथा जिन इंद्र के विषय
में अर्चना के साधन मंत्र आश्रित हैं, वह इंद्र हमें पाप से बचाएं. (५)
यः प्रथमः कर्मकृत्याय जज्ञे यस्य वीर्यं प्रथमस्यानुबुद्धम्.
येनोद्यतो वज्रो ऽ भ्यायताहिं स नो मुञ्चत्वंहसः.. (६)
जो इंद्र प्रमुख रूप से ज्योतिष्टोम आदि यज्ञ करने के लिए उत्पन्न हुए थे, जिन प्रमुख
इंद्र का वृत्र हनन संबंधी शौर्य कर्म प्रसिद्ध है तथा जिन के द्वारा उठाया गया वज्र सभी ओर
हिंसा करता है, वह इंद्र देव मुझे पाप से बचाएं. (६)
यः सङ्ग्रामान् नयति सं युधे वशी यः पुष्टानि संसृजति द्वयानि.
स्तौमीन्द्रं नाथितो जोहवीमि स नो मुञ्चत्वंहसः.. (७)
जो स्वतंत्र इंद्र प्रहार करने के लिए युद्ध करते हैं, जो पुष्ट स्त्रीपुरुषों के जोड़े बनाते हैं, मैं
फल की कामना से उन्हीं इंद्र की स्तुति करता हूं और उन के निमित्त बारबार हवन करता हूं.
वह मुझे पाप से छुड़ाएं. (७)
सूक्त-२५ देवता—वायु, सविता
वायोः सवितुर्विदथानि मन्महे यावात्मन्वद् विशथो यौ च रक्षथः.
यौ विश्वस्य परिभू बभूवथुस्तौ नो मुञ्चतमंहसः.. (१)
वायु और सविता के वेदों में वर्णन किए गए कर्मों को मैं जानता हूं. हे वायु एवं सविता
देव! तुम दोनों स्थावर और संगम जीवों में प्रवेश करते हो एवं रक्षा करते हो. तुम दोनों विश्व
की रक्षा के लिए उत्पन्न हुए हो. तुम दोनों हमें पाप से छुड़ाओ. (१)
ययोः सङ्ख्याता वरिमा पार्थिवानि याभ्यां रजो युपितमन्तरिक्षे.
ययोः प्रायं नान्वानशे कश्चन तौ नो मुञ्चतमंहसः.. (२)
जिन वायु और सविता देव के महत्त्व जनों के द्वारा भलीभांति प्रसिद्ध हैं, जिन दोनों के
द्वारा आकाश में जल को धारण किया जाता है तथा कोई अन्य देव जिन वायु और सविता के
उत्तम गमन को प्राप्त नहीं कर पाता, वे दोनों हमें पाप से मुक्त करें. (२)
तव व्रते नि विशन्ते जनासस्त्वय्युदिते प्रेरते चित्रभानो.
युवं वायो सविता च भुवनानि रक्षथस्तौ नो मुञ्चतमंहसः.. (३)
हे सविता! तुम से संबंधित कर्म में लोग नियम से लगे रहते हैं. हे विचित्र दीप्ति वाले
सूर्य! तुम्हारे निकलने पर सभी लोग अपनेअपने काम में लग जाते हैं. तुम दोनों अर्थात् वायु
और सविता लोकों की रक्षा करते हो. तुम दोनों हमें पाप से बचाओ. (३)