अथर्ववेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)
Atharvaveda Samhita with Hindi Translation
by डा. गंगा सहाय शर्मा
Source: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (origin)
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Read in contextरहता है. हे यज्ञोपवीतधारी ब्रह्मचारी! मैं इस प्रकार से शंख के रूप में स्थित स्वर्ण को तेरे
शरीर में चिरकाल जीवन के लिए बांधता हूं. यह स्वर्ण संबंधी मणि तुझे शक्ति, तेज एवं दीर्घ
आयु प्रदान करने के साथसाथ सौ वर्ष तक तेरी रक्षा करे. (७)
सूक्त-११ देवता—इंद्र के रूप में
अनड्वान्
अनड्वान् दाधार पृथिवीमुत द्यामनड्वान् दाधारोर्व १ न्तरिक्षम्.
अनड्वान् दाधार प्रदिशः षडुर्वीरनड्वान् विश्वं भुवनमा विवेश.. (१)
गाड़ी ढोने में समर्थ बैल हल जोतने आदि के कारण पृथ्वि का पोषक है. वही बैल चरु,
पुरोडाश आदि की उत्पत्ति में सहायक होने के कारण आकाश और अंतरिक्ष को भी धारण
करता है. पूर्व आदि महा दिशाओं का पोषण कर्ता भी यही धर्म रूपी बैल है. इस प्रकार ब्रह्मा
द्वारा बनाया गया यह बैल पृथ्वि आदि सभी लोकों की रक्षा के लिए उन में प्रवेश कर के
स्थित रहता है. (१)
अनड्वानिन्द्रः स पशुभ्यो वि चष्टे त्र्याञ्छक्रो वि मिमीते अध्वनः.
भूतं भविष्यद् भुवना दुहानः सर्वा देवानां चरति व्रतानि.. (२)
यह बैल इंद्र है. इसलिए सभी पशुओं की अपेक्षा अधिक तेजस्वी है. जिस प्रकार बैल
अविच्छिन्न रूप से संतान उत्पन्न करता है, इंद्र उसी प्रकार भूत, भविष्य और वर्तमान वस्तुओं
को उत्पन्न करता हुआ अन्य देवों के कार्य करता है. (२)
इन्द्रो जातो मनुष्येष्वन्तर्घर्मस्तप्तश्चरति शोशुचानः.
सुप्रजाः सन्तस उदारे न सर्षद् यो नाश्नीयादनडुहो विजानन्.. (३)
मनुष्यों में वह बैल इंद्र के समान है. वह बैल धर्म है. वह सूर्य के रूप में सारे जगत् को
ऊर्जा एवं प्रकाश देता हुआ विचरण करता है. जो हमारे द्वारा बैल को दिया गया महत्त्व
विशेष रूप से जानता है, वह सभी सुखों को भोगता है और शोभन संतान युक्त हो कर देह
त्याग करने के बाद संसार में नहीं आता. (३)
अनड्वान् दुहे सुकृतस्य लोक ऐनं प्याययति पवमानः पुरस्तात्.
पर्जन्यो धारा मरुत ऊधो अस्य यज्ञः पयो दक्षिणा दोहो अस्य.. (४)
इंद्र देव रूपी यह बैल यज्ञ आदि पुण्य से प्राप्त लोकों में अधिक फल देता है. यज्ञ के
आरंभ में शोधन किया गया यह अमृतमय सोम इस बैल को रस से भर देता है. वृष्टि प्रेरकदेव
दुग्ध की धारा है. उनचास पवन ऐन हैं, सभी प्रकार का यज्ञ इस का दूध है और यज्ञ में दी गई
दक्षिणा ही दुहने की क्रिया है. इस प्रकार इस इंद्र और धर्म रूपी बैल का दोहन अक्षय होता
है. (४)
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