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अथर्ववेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

अथर्ववेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

Atharvaveda Samhita with Hindi Translation

by डा. गंगा सहाय शर्मा

Source: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (origin)

DevanagariSanskritpublished1,063 pages

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जो हवि देखने की शक्ति प्रदान करती है तथा जिस से सुनने आदि की सैकड़ों शक्तियां
प्राप्त होती हैं, उस हवि की शक्ति से मैं इस रोगी को मृत्यु से लौटा लाया हूं. उस हवि में सौ
वर्ष जीने का फल प्रदान करने की शक्ति है. मैं हवि के द्वारा इंद्र को इस कारण प्रसन्न करता
हूं कि ये इस पुरुष को सैकड़ों वर्ष तक की आयु का विनाश करने वाले पापों से छुटकारा
दिलाएं. इस प्रकार यह सौ वर्ष तक जीवित रह सके. (३)
शतं जीव शरदो वर्धमानः शतं हेमन्ताञ्छतमु वसन्तान्.
शतं त इन्द्रो अग्निः सविता बृहस्पतिः शतायुषा हविषाहार्षमेनम्.. (४)
हे रोग से मुक्त पुरुष! तुम प्रतिदिन वृद्धि प्राप्त करते हुए सौ शरद ऋतुओं, सौ हेमंत
ऋतुओं और सौ वसंत ऋतुओं तक जीवित रहो. इंद्र, अग्नि, सविता और बृहस्पति तुम्हें सौ
वर्ष की आयु प्रदान करें. सैकड़ों वर्ष की आयु प्रदान करने वाले हवि के द्वारा मैं इसे मृत्यु के
पास से लौटा लाया हूं. (४)
प्र विशतं प्राणापानावन्डवाहाविव व्रजम्.
व्य १न्ये यन्तु मृत्यवो यानाहुरितरान्छतम्.. (५)
हे प्राण और अपान वायु! जिस प्रकार वृषभ अपनी पशुशाला में प्रवेश करता है, उसी
प्रकार तुम इस क्षय रोग से ग्रस्त रोगी के शरीर में प्रवेश करो. इस राजयक्ष्मा के अतिरिक्त, जो
मृत्यु के हेतु सैकड़ों रोग कहे गए हैं, वे भी इस रोगी से विमुख हो जाएं. (५)
इहैव स्तं प्राणापानौ माप गातमितो युवम्.
शरीरमस्याङ्गानि जरसे वहतं पुनः.. (६)
हे प्राण और अपान वायु! तुम इस के शरीर में ही रहो, इस के शरीर से अकाल में ही
मत निकलो. इस रोगी व्यक्ति के शरीर के हस्त, चरण आदि अंगों को तुम वृद्धावस्था तक मत
त्यागो. (६)
जरायै त्वा परि ददामि जरायै नि धुवामि त्वा.
जरा त्वा भद्रा नेष्ट व्य १ न्ये यन्तु मृत्यवो यानाहुरितरान्छतम्.. (७)
हे रोग मुक्त पुरुष! मैं तुझे वृद्धावस्था को देता हूं अर्थात् तुझे वृद्धावस्था तक जीवित
रहने वाला बनाता हूं. मैं वृद्धावस्था तक रोगों से तेरी रक्षा करता हूं. वह वृद्धावस्था तुझे
कल्याण प्राप्त कराए. (७)
अभि त्वा जरिमाहित गामुक्षणमिव रज्ज्वा.
यस्त्वा मृत्युरभ्यधत्त जायमानं सुपाशया.
तं ते सत्यस्य हस्ताभ्यामुदमुञ्चद् बृहस्पतिः.. (८)
हे रोग मुक्त पुरुष! जिस प्रकार गर्भाधान में समर्थ बैल को रस्सी से बांधा जाता है, उसी
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